साहित्य

मैं बेटी हूँ बेटी ही रहने दो ना

कुमारी मंजू मानस

मैं बेटी हूँ बेटा नही मुझे बेटी ही रहने दो ना !
लेकिन दुनियाँ के स्वरूप को मुझे भी बदलने दो ना!!
मैं भी खिलना चांहुँ मुझे भी फूल बन खिलने दो ना!
मेरी भी बातों को खुद की बातों से सबके पास रखने दो ना !!


सोच मेरी अच्छी हो तो माँ सबको समझने दो ना!
अगर अच्छी लगती बातें मेरी तो उस पर विचार करो ना !!
मैं भी पढ़ना चाहूं पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहूं!!
दुनियाँ के स्वरूप को माँ मैं भी बदलना चाहूं!!


जरूरी नही मेरे विचार अच्छे ही लगते हो !
उसपर तुम अमल करो आगे भी बढ़ने दो ना !!
माँ बहन दादी तुमतो समझो मैं भी तेरा ही स्वरूप हूँ!
बेटी बनकर आज तेरे सामने तेरे सपनो का हर रूप हूँ !!


विश्वाश की नींव जगाकर रखना सबको तुम समझा कर रखना !
दुनियाँ में बेटी कब गलत होती ये हैं ये बेटियाँ !!
मान अभिमान बना कर रखूँगी तेरा स्वाभिमान बना कर रखूँगी!
तेरे दिल मे छवि जो हमारी उसको मैं सजा कर रखूँगी!!


बेटी हूँ बेटी हूँ रहूँगी तेरा हर मुश्किल को हटा कर रखूँगी!
कभी कभी तुम भेद भी करोगी तो वो सब मैं सही होने पर सह लूँगी!!
दुनियाँ के बुरी नजरो से खुद को मैं नजरो से बचा कर रखूँगी!!
घूँघट अपनी डाल कर मैया तेरे अपने सपने पूरे करूँगी !!


बराबरी नही मुझे थोड़ा प्यार देना दुनियाँ को मैं समझा कर रखूँगी !
अगर फिर भी गलत बोले तो मैया मेरी मैं बुराई से टकरा कर रखूँगी !!
तुम लोग समझ लेना तेरी बेटी पर्दे में हर वादा निभा कर रखूँगी !
कभी कोई आंच ना आने दूँगी ऐसे सपने सजा कर रखूँगी !!


माँ बेटी हूँ मुझे बेटा कह कर मेरा अपमान ना करना तुम!
बेटी कह मेरा मान रखना मैं बेटा जैसे सुख दुख में हर वादा निभा कर रखूँगी!!
दुनियाँ चाहे कुछ भी कह ले तुम मेरा विश्वास बना कर रखना !
मैं बेटी हूँ बेटी बन कर तेरा घर खुशहाल रखूँगी!!


कुमारी मंजू मानस
बिहार शिक्षिका
छपरा सारण
मौलिक
स्वरचित

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