साहित्य

मौन को आवाज़ दो

शिखा अरोरा

मौन तुझको अब रहना नहीं है ,
नीर और यहांँ बहाना नहीं हैं |
बहुत सहे तुमने ज़ुल्मों सितम ,
अब और यहांँ सहना नहीं हैं |
बोल न पाई जो अब तलक ,
उन शब्दों को सीना नहीं हैं |
लफ्जों में बदलो मौन को ,
पिंजरे में अब जीना नहीं हैं |
मौन को अपने आवाज दो,
मंजिल को पाकर अंजाम दो |
अवारों की महफिल छोड़कर,
इरादों को अपने आकाश दो |
लोग यहांँ हर वक्त कहेंगे तुमसे ,
चुप रहने की होगी गुजारिश तुमसे |
गलत काज किसी का करना नहीं हैं ,
बेटियों अब तुमको चुप रहना नहीं हैं |
जलाई ना जाओं कहीं किसी दिन ,
दहेज प्रथा को तोड़ना ही होगा |
लोभियों से दुनिया को बचाकर,
प्रेम रस दिलों में घोलना ही होगा |
मौन को अपने आवाज तुम बना लो ,
जीती जागती नारी हो एहसास करा दो |
कुछ भी तुम कर सकती हो जग में ,
अधिकारों को तुम अपने बचा लो ||

शिखा अरोरा (दिल्ली)

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