कवितासाहित्य

यहां अकेले रहना है

राजीव कुमार झा

सपनों की गलियों में
धूप खिली है
रिमझिम बारिश
शुरू हुई
यादों का मौसम
धूल उड़ाता आया
पेड़ के पास बैठी
गुमसुम दुपहरी
किसने गीत सुनाया
उसी राह पर
जीवन का स्वर
जिस निर्जन के
पास बुलाया
सबके मन में
उसका भाव समाया
काफी दूर
अभी चलना है
फिर घर पर आकर
हर झंझट से बचना है
यहां अकेले रहना है
कार्तिक के‌ मौसम में
जीवन
नीलकुसुम बन जाता
खेतों से आकर किसान
खूब सुखी हो जाता
दिवाली में रंगबिरंगे
दीप जलाता
वर्षा से गड्ढों में
जो पानी भर जाता
वह उसमें जाकर
कभी नहाता
अरी सुंदरी !
वह कभी कमल के
फूलों की माला
सूरज को पहनाता
भीगी मिट्टी में
बीज डालने
वह अक्सर घर के
बाहर जाता
चतुर्दिक सुख छाया है
जब से हमने
यह पाया है
नया सवेरा आया है
प्रेम का अंकुर
कितना पावन
प्रथम पहर में
मेघ का गायन
हवा कभी
चंचल हो जाती
मंद वेग से
खिड़की पर आती
तब तुम आकर
मुस्कान लुटाती
यह जीवन धन्य
बना है!
तुम नीले अंबर की
छाया
शीतल शांत
रात की काया
स्निग्ध भाव से
तुमको चांद
निहारे
नदिया के उसी
किनारे!


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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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