कवितासाहित्य

यह धूप

राजीव कुमार झा

हम प्रेम को
पाकर
सबको इसे अब
बांटना चाहते
इसे कोई
यहां क्यों
अपने पास रखें
सबको देकर
प्रेम को हम
सबसे पाना
चाहते!
अरी प्रिया ,
हम सुबह
बादल की
ओट में
सूरज को
पुकारते
अपने मन में
झांकते
नदी का जल
बहता
चला जा रहा!
सूरज इसकी
धारा में
उतर आया
यह आकाश की
काया
सबके मन की
माया
शाम के
धुंधलके में
क्षितिज की
ओट में
विलीन जाती
रात घिर आती
तुम सितारों के
संग
चांद को देखकर
मुस्कुराती
यह धूप
कितनी सुंदर है

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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