साहित्य

रात भर दीपक जले

डॉ पुष्पलता

सूरतों से कुछ उदासी को चुराने के लिए

गफलतों की आंख से पर्दा हटाने के लिए

जख्म हँसते रोते लोगों को दिखाने के लिए

पाँव के छालों की हिम्मत को बढ़ाने के लिए

आँख के सूखे हुए आँसू हँसानेके लिए

मरते -मरते जीने के कोई बहाने के लिए

बेबसी की झुक गई पलकें उठाने के लिए

टूटते कंधों पे हाथों को थमाने के लिए

जलजले को जलजले का डर दिखाने के लिए

रेत के सीने पे फिर से घर बनाने के लिए

कंकडों के वक्ष पर जंगल उगाने के लिए

कांपती धरती को कुछ धीरज बंधाने के लिए

सत्य के सीने पे लेटी सिल हटाने के लिए

नाखुदा को फिर खुदा से कुछ मिलाने के लिए

मुफलिसी का हौंसला फिर आजमाने के लिए

मातमी सन्नाटों में घुँघरू बजाने के लिए

जलजले में जिंदगी के मुस्कराने के लिए

इन अंधेरों के सिरों पर शामियाने के लिए

आंधियों को राह में राहें दिखाने के लिए

तुझसे मुझ तक उस नज़र के आने जाने के लिए

रात भर दीपक जले सूरज बुलाने के लिए

डॉ पुष्पलता मुजफ्फरनगर

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