साहित्य

राम -भरत का चित्रकूट मिलन (कुंडलिया)

वीणा गुप्त

(१)

संदेश पाया गुरु का, लौटो तुम तत्काल।
मन कंपितशंकित हृदय,भरत शत्रुहन लाल।
भरत शत्रुहन लाल, चित्त में धीर न आवै।
फड़के बाईं आँख, कछु नहीं मन को भावै।
ले नाना से विदा, आए तब अवध प्रदेश।
शोक मग्न थे सभी,था अशुभ भरा संदेश।

(२)
नैन भरे अँसुवन जल, रहे भरत अकुलाय ।
कैसे लौटें राम सिय, सोचत रहे उपाय।
सोचत रहे उपाय, मन वन गमन की ठानी।
मंत्री पुरजन संग, साथ लेकर सब रानी।
पितु निधन से आहत, मन है उनका बेचैन।
नहीं बनत कहत यह,भर-भर आवैं युग नैन।
(३)
लछिमन देख्यौ दूर ते,भ्राता सैन्य विशाल।
भृकुटि बंक भई तुरतहि,तन कंपित मुख लाल।
तन कंपित मुख लाल,धनुष तान बोले वचन।
हो कर रहे विनाश, सुने सकल धरती गगन।
हड़प राज्य अवध का, तुष्ट नहीं है भरत -मन,
शठ माँ का पूत शठ, रोष से कंपित लछिमन ।
(४)
रोष देखकर लखन का, सिय रघु हुए अधीर।
किस कारण विचलित हुए, लक्ष्मण जैसे वीर।
लक्ष्मण जैसे वीर, है बंधु कहो क्या बात।
दल ले आवत भरत, अब हम पर करने घात।
बोले मुसका राम, नहीं कछु भरत को दोष
भरत नहीं करें यह, छोड़ो लछिमन तुम रोष।
(५)
चरन गहे तब राम के, भरत शत्रुहन आय।
शोकाकुल हैं सभी जन, महतारी बिलखाय।
महतारी बिलखाय, राम सीय आकुल होय
कोई हुआ अनर्थ, कहत नहीं कुछ भी कोय।
देख दशा भरत की, बहुत लज्जित हुए लखन।
लौटो अब अवध प्रभु, भरत कहें गह प्रभु चरन।
(६)
बातजान पितु निधन की,राम लखन बिलखाय।
जाय मंदाकिनी तीर, तर्पण कीन्हा जाय।
तर्पण कीन्हा जाय, गुरु सभी आकुल देखे।
राम धरो उर धीर, मिटे ना विधि के लेखे।
भ्राता का अनुरोध, मैं कैसे मानूं तात।
रखूँ पिता का वचन, या रखूँ भरत की बात ।
(७)
निस्तार होय दुविधा सब,कीजै उचित उपाय।
आन रहे पितु वचन की, भरत मान नहि जाय।
भरत मान नहि जाय,तात कुछ ऐसा कीजै।
सभी करें गुण गान,आदर्श ऐसा दीजै।
भरत बोले नत सिर,गुरु वचन मुझे स्वीकार।
चतुर सुजान राघव ,कर सकें यहाँ निस्तार ।
(८)
राम बोले सुनो भरत, मानो गुरु की बात।
पितु वचन तो नहीं टलै, सत्य यही है तात।
सत्य यही है तात, अब तुम अवध संभालो।
परिजन पुरजन संग, सभी कुछ देखो-भालो।
भर नयन कहें भरत, नाथ हुआ पूरणकाम।
क्षमा किया आपने, अब धन्य हुआ मैं राम।
(९)
तव आज्ञा मम शीश पर, जो चाहो सो होय
जब तक प्रभु वन में बसें, रखूँ अवध संजोय।
रखूं अवध संजोय, बरस चौदह रही बात ।
समय पर आना प्रभु, नहीं तो तजूँ यह गात।
दो प्रभु निज पादुका, यही धरोहर बने अब।
धरा और गगन में , गूँजे भरत कीर्ति तव।
(१०)
आचरण श्रेष्ठ भरत का, बोल उठे जन सभी
राम भरत सी प्रीत यह, देखी नाहीँ कभी।
देखी नाहीं कभी, सुर गण बरसाए फूल।
शीश धरी भरत ने, भ्राता चरननि की धूल।
चले विदा ले भरत, परत धरा डगमग चरण।
सजल हुए सब नयन, निरख भरत का आचरण।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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