साहित्य

राम वनवास

कर्ता कोई भरे कोई हाय ये कैसी
विडंबना आई ।
प्रजा जिनके देख रही थी सपनें
हाय कैसे उसे वनवास भेजा जाए
रोए खुद कौशल्या माई ।

अपने प्रभु के जो दिन-रात गुण गाती
ऐसी प्रजा के ना रूके आँखो से अश्रु ।

भाई लक्ष्मण, पत्नी सीता संग जाने
को हो गए राज़ी ।

प्राण जाए पर वचन ना जाए ।
ऐसा कथन हाय क्यो निभाया
महाराज दशरथ ने ।

वर्षो से चल रहीं परम्परा को ना
तोड़ा राम ने ।

लिया आशीष मात पिता का
संग सीता और लक्ष्मण के निकल पड़े
वनवास को ।

हाय ये कैसी विडम्बना आई
नियति ने भी क्या खेल दिखाई ।

करे कोई भरे कोई क्यों प्रभु के
तकदीर में वनवास लिखाई ।

हाय ये कैसी विडम्बना आई ।।

लेखिका साहित्यकार कवियत्री निर्मला सिन्हा

ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ से

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