साहित्य

रावण कलियुग में अनेक

डॉ.अनिल शर्मा अनिल

त्रेता में था रावण जो, उसकी तो बात छोड़ो,
आज यहां कलयुगी, कई विद्यमान हैं।
आसुरी प्रवृत्ति वाले, दुष्ट, दुराचारी,ढोंगी
रावण की तरह से, बनते महान हैं।।
विद्वता में शून्य है वह, ज्ञानी बने घूमते जो,
सच जानिएगा वह, खुद अनजान हैं।
रावण को गरियाते, बात यह भूल जाते,
रावण सा हुआ नहीं, कोई भी विद्वान है।।

आज कथित रावण, विद्वता से बड़ी दूर,
आसक्त हैं माया वश, ज्ञानी ध्यानी है नहीं।
नीति और अनीति को, जानते नहीं है वह,
कौन कर्म वर्जित है, और कौन है सही।।
खानपान आचरण, दानवी प्रवृत्ति वाला,
जीवन में कोई गुण, मानवीय है नहीं।
त्रेता में था एक वह, कलयुग में अनेक,
दानवी असुर अब, मिलते हर कहीं।।

  • डॉ.अनिल शर्मा अनिल,
    धामपुर, उत्तर प्रदेश
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