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रिश्ते अनमोल हैं


__शेख रहमत अली बस्तवी
बस्ती (उ, प्र,)



            आज सुबह रोहन नाश्ते के टेबल पर जैसे बैठा ही था, कि अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दिया,  रोहन की बीवी ने दरवाज़ा खोला तो दरवाजे पर खड़े व्यक्ति ने पूछा भाभी जी रोहन घर पर है क्या?,,, रोहन की बीवी ने कहा आप कौन? धीमी स्वर में आकाश! मैं रोहन का लंगोटिया यार इतना सुनते ही नाश्ते के टेबल से उछल कर रोहन उठ खड़ा हुआ। दौड़कर दोनों यार सीने से लिपट गये, आखिर! दोनों 15 साल बाद जो मिले हैं, अर्चना ये सब देखकर दंग रह गई। 
             अर्चना आप दोनों का भरत मिलाप खत्म होगा या नहीं घर में भी चलो अब, आकाश भाभी जी सिर्फ़ मुझे ही अंदर आने को कहेंगी या रोहन की भाभी रंजना को भी?,,, घर के बाहर थोड़ी दूर जो रोड़ के उस पार खड़ी आकाश के आने का इंतजार कर रही है। रोहन सुनते ही लपक कर रंजना के पास जा पहुंचा साथ में अर्चना भी, रोहन भाभी जी आपने तो मेरे दोस्त को मुझसे छीन लिया, अब आकाश पहले जैसा नहीं रहा बिना मेरे इसे नींद तक नहीं आती थी। 
            रंजना- भाई साहब मैं आपके दोस्त को कैसे छीन सकती हूँ, आपके बारे में इन्होंने मुझे सब कुछ बताया है, कि आप दोनों बचपन में क्या-क्या गुल खिलाया करते थे। आकाश अब अंदर भी ले चलोगे या यहीं बातें करते रहोगे, अर्चना आइये भाई साहब बहन आप भी आइये! सभी लोग घर में प्रवेश करते हैं, अर्चना आप सब नाश्ते के टेबल पर बैठिये मैं नाश्ता लगाती हूँ, अर्चना किचन की तरफ़ जाती है, 

रोहन- यार तू इतने दिन बाद आया है, कोई फोन कॉल भी नहीं अचानक ही आ टपका कम से कम एक फोन तो किया होता।
आकाश- कैसे करता तुम्हें तो पता ही होगा मां की तबियत ख़राब है, और सुनने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और भागा चला आया पर पिता जी?,,,
रोहन- पिता जी को क्या हुआ? वो तो कल ही मिले थे, मां का हाल पूछा तो कहने लगे पहले से बेहतर है।
अर्चना- भाई साहब नाश्ता करिये!
आकाश- मैं अभी-अभी आया हूँ, उन्होंने घर में दाख़िल नहीं होने दिया कहते हैं, कि मैंने उनके विरुद्ध जाकर शादी कर ली है, गाँव और रिश्तेदारों में उनकी बेईज्जती हुई है।
रोहन- अरे हां मैं तो पूछना ही भूल गया, लोगों की छोड़ इतनी भी क्या मजबूरी थी, जो तूने मुझ जैसे लंगोटिया यार को बुलाना मुनासिब नहीं समझा!
आकाश- तुझे विश्वास है कि मैं तेरे बिना दूल्हा बन जाऊँ! सब कुछ इतना जल्दी हो गया, कि शायद मुझे भी पता नहीं चला।
अर्चना- पर भाई साहब ऐसा भी क्या हुआ! जो इतनी जल्दबाजी में आपकी शादी हो गई और आपको पता तक न चला।
आकाश- भाभी जी अब आप रंजना से ही पूछ लो!
रंजना- बहन आज से सात महीनें पहले की घटना है, मेरे चाचा जी पिता जी को जायदाद के सिलसिले से बहुत डराते धमकाते और कहते बेटी की शादी करके विदा कर दो। इसी डर से पिता जी ने मुझे साथ लेकर कोर्ट गये, और अपनी सारी चल-अचल संपत्ति को मेरे नाम कर दिया। ये सब करके हम घर लौट रहे थे कि अचानक किसी गाड़ी ने टक्कर मारी मैं सड़क के उस पार जा गिरी और पिता जी एक पेंड से जा टकराये।
मुझे तो पता भी नहीं की कब इन्होंने हमें अस्पताल में भर्ती करवाया जब मुझे होश आया तो मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटी थी, और पास में दूसरे बेड पर पिता जी जिनकी हालत मुझसे भी ज्यादा ख़राब थी, और सामने ये खड़े थे। मानो ईश्वर ने इन्हें हमारे लिये फ़रिश्ता बनाकर भेजा था।
जब पिता जी को होश आया तब मैंने बताया कि इन्होंने हमारी जान बचाई है, तब पिता जी ने इनको पास बुलाया और कहा बेटा मेरी जितनी चल-अचल संपत्ति है, सब मैंने इस बेटी के नाम कर दिया है, और लगता है मेरा आख़िरी समय आ गया है,
और मेरी आख़िरी इच्छा ये है कि मैं अपनी बेटी का कन्यादान कर दूँ उसके बाद मरना चाहता हूँ, मुझे लगता है तुम इसके क़ाबिल हो और मेरी बेटी का खयाल रखना, इतना कहकर मेरा हाथ इनके हाथ में रख कर वो दुनियाँ छोड़कर चले गए।
रोहन और उसकी पत्नी अर्चना के आँखों में आंसू आ गये।
रोहन ढांढस बंधाते हुये इतना उदास मत हो भाभी जी हम हैं न सब कुछ ठीक हो जायेगा।
रोहन- अर्चना मेरे यार के लिए कुछ खाने का इंतजाम करो मैं कुछ काम से जा रहा जल्द ही वापस आ जाऊंगा।
अर्चना- जी अच्छा!
रोहन घर से निकलकर सीधा आकाश के घर जाता है, और आकाश की मां को सारा मामला बता देता है। और कहता है आपके बेटे ने आपका नाम मिट्टी में नहीं मिलाया बल्कि आपका सर फक्र से ऊँचा किया है, रिश्ते कोई भी हों अनमोल होते हैं, अब आप उन्हें घर में आने दो या नहीं आपकी मर्जी मैं चलता हूँ।
रोहन की इतनी सी बातों ने आकाश की मां और पिताजी की आँखें खोल दी आकाश के पिता जी ने कहा रुको बेटा मैं भी चलता हूँ, रोहन के साथ आकाश के पिता जी भी आये और आकाश से बेटा मुझे माफ़ कर दे मैंने तुझे गलत समझा इतने में दोनों बाप-बेटे गले से लिपट गये।

शेख रहमत अली बस्तवी
बस्ती (उ, प्र,)

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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