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रिश्तों को कद्र भी आजकल

__राजेश राठौर

रिश्तों को कद्र भी आज कल जैसे
मानो बाज़ार के समान सी हो गई
मिला-लाए खाया और ख़त्म हुआ
आते जाते रुपए पेसो सी हो गई
रिश्तों की कद्र भी आजकल,,2!!

कोई मिला नही उसे दूसरा तब तक तो बस आप है
जैसे ही आया दूसरा आपका पत्ता समझो साफ़ है
तुम जोड़ते मानते कहते थक हार जाओगे उसे
उसके सामने तुम्हारी क़ीमत अब शून्य सी हो गई
रिश्तों की कद्र भी आजकल,,2!!

जहां देखो वहां पैसे वालों का बोलबाला है
उन्हीं का राज़ उन्हीं का सिक्का उछाला है
जिसके पास दिल तो है मगर जेब में पैसे नही
उसकी किस्मत और वो लगता है जैसे दोनों सो गई
रिश्तों की कद्र भी आजकल,,2!!

कोई भले कितना अमीर हो दिल का ओर मन का
उसकी कोई वैल्यू नही है आज वह ज़ीरो है तन का
दिखावे पर मरने वाली यह सारी मतलबी दुनिया
झूठों के पीछे मानो पीछे जाने की होड़ सी हो गई
रिश्तों की कद्र भी आजकल,,2!!

भरोसा भी टूट रहा है एक दूसरे पर एक दूसरे का धीरे धीरे
विश्वास भी हाथ से छूट रहा है एक दूसरे का धीरे धीरे
इसका महज़ सबसे बड़ा कारण ओर एक यही वज़ह है
सत्य से अवगत कराना भले को बताना बुराई सी हो गई
रिश्तों की कद्र भी आजकल,,2!!

राजेश राठौर

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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