कवितासाहित्य

रोटियाँ


__कात्यायनी कदम

रोटियाँ गोल करते करते
औरतें लगाती हैं कई-कई चक्कर
अपनी अपनी दुनिया की।
चुल्हे से निकलती आग
जलाती हुई ऊँगलियाँ
याद दिलाती है
कि जब ये उनकी बनाई
गोल रोटियाँ दूसरे खाते हैं
तो साथ ही खा रहे होते हैं
उनके सपने,
उनका विश्वास,
उनका समर्पण,
उनका प्रेम और
उनकी आजादी।
ये गोल रोटी की परिभाषा
औरतों के भविष्य को
अपने जैसा ही
गोल बना देती है।

कात्यायनी कदम

अँग्रेजी विभाग, पटना विश्वविद्यालय

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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