साहित्य

लोक साहित्य : कंप्यूटर बाबा

कंप्यूटर बाबा के जमानवा आयल!
घर कार्यालय दुकान कंप्यूटर छायल!!

सॉफ्टवेयर विकसित भइल निया निया!
सगरो लौकत बा कंप्यूटर हियाँ- हुआँ!!

होला अब तऽ ऑनलाइन खरीदारी!
ओमे बा कंप्यूटर के भागीदारी!!

अमेजॉन फ्लिपकार्ट स्नैपडील मिंत्रा!
के सैर करेंले लोगनि देखिके चित्रा!!

घुस्सल बा ई मानव जीवन के भीतर…
कंप्यूटर युग में मानव जाय तऽ किधर!?!

कंप्यूटर पर मेल भेजऽ, चैट करऽ…!
गूगल ड्राइव पर जा, डाटा सिंघाड़ऽ…!!

कंप्यूटर पर ऑनलाइन पढ़, काम कर…!
घरवे बइठल- बइठल दुनिया तमाम कर!!

कंप्यूटर महिमा बिखरल सगरि नमन कर!
अब तऽ कंप्यूटर – नेट – अति के दमन कर!!

डॉ पंकजवासिनी
असिस्टेंट प्रोफेसर
भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!