कवितासाहित्य

वक्त

__राजेश प्रजापति

अभी सब कुछ ठिक ठाक है,
कौन अपना है कौन पराया
कुछ समझ ना आएगा
बक्त गुजरते गुजरते इतना गुजर जाएगा।

सब कुछ होगा अलग अबसे
दूरिया बड जाएंगी सभी की सबसे
होगे रिश्तेदार तमाम दुनिया मे
मुसीबत मे काम कोई न आएगा
बक्त गुजरते गुजरते इतना गुजर जाएगा।

ऐसी बक्त की मार होगी
औरो से होंगे सम्बन्ध घनिष्ठ
सगे भाई भाई मे तकरार होगी
जख्म देने बाला ही खुद
जोर जोर से चिल्लाएगा
बक्त गुजरते गुजरते इतना गुजर जाएगा।

बक्त मे परिवर्तन होंगे न्यारे न्यारे
वे बजहा मानव मानव को मारे
हिंसा बहुत फूले और फलेगी
धर्म की पुनः पुनः नार कटेगी,
धर्मी बिल्कुल धूडे से न मिलेंगे
हर घर आस्तीनो के साप पलेंगे
वंशज ही वंश का पतन कराएगा
बक्त गुजरते गुजरते इतना गुजर जाएगा।

छिंग विंन होंगे इक माके जाए
हो जाएंगे सब पल मे पराए
अपने रिश्तो को भी न पहचानेंगे
एक दूजे पर खडग तानेंगे
पिता ही पुत्र को बिष पिलाया
बक्त गुजरते गुजरते इतना गुजर जाएगा।

राजेश प्रजापति
(बरेली)

100% LikesVS
0% Dislikes

Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!