साहित्य

वन्दना बांकेबिहारी

सुबोध कुमार शर्मा शेर कोटी


हे बांके बिहारी भव कष्टहारी
तेरी शरण में मैं आ गया हूँ।
में था अटका मोह में भटका
भक्ति पथ मै अब पा गया हूँ। 1।

चरणरज मुझे दो अनुराग भर दो
तेरा रहस्य मै पा गया हू्ँ।
गरीब नवाज तुम हो कहलाते
जग का गरीब में आ गया हूँ 2।।

भक्तों पर तूने प्रेम। लुटाया
प्रेम भिखारी मैं आ गया हूँ।
आ भी जाओ दर्श दिखाओ
प्रतीक्षा करके तंग आ गया हूँ3।।

मंम भाग्य रूठा तुम भी हो रूठे
मैं समर्पण को आ गया हूँ।
श्रद्धा सुमन को मैं संग लेकर
अर्पण को तेरे मैं आ गया हूँ।4।।

गज, प्रहलाद भक्तों को तूने
दारुण दुःखो में था उबारा
वही भक्ति भाव संग में लेकर।
तेरे दर पर मैं आ गया हूँ।5।

कलयुग ने मुझको है भरमाया
भाग्य जगाने में आ गया हूँ।
मानव मन मेला क्यों है इस जग में
यह समझने में आ गया हूँ 6।।

दिन दुखियो को तूने है तारा
भवसागर तरने में आ गया हूँ।
जग दुखों को सद्य नसाओ
विनती संग में ले आ गया हूँ।।7

राष्ट्र मेरा राम सुदृढ़ बनाओ
यह भाव उर में मैं ला गया हूँ।
मैं अबोध था भक्ति न की थी
बनकर सुबोध मैं आ गया हूँ 8।।

सुबोध कुमार शर्मा शेर कोटी
गदरपुर उधम सिंह नगरउत्तराखंड

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