लघु कथासाहित्य

वर्तमान की कराह

डॉ. रीना रवि मालपानी

राधा के मस्तिष्क में कई समय से विचारों का कोलाहल हो रहा था। कुछ समय पहले एक अनोखे परिवार के संपर्क में आई। वह परिवार जिसमें रुपए को प्राथमिकता देना सबसे महत्वपूर्ण था और बच्चे का वर्तमान बर्बाद किया जा रहा था। माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे। माँ की सरकारी नौकरी और पिता की प्राइवेट नौकरी थी। ईश्वर की कृपा समझिए की पैसे की प्रचुरता थी, पर दोनों के लिए ही नौकरी महत्वपूर्ण थी। प्रेम-विवाह किया गया। दोनों अलग-अलग स्थानों पर नौकरी रहते थे। दूरी भी उन दोनों के स्थान की बहुत ज्यादा थी, पर शायद कैरियर की भाग-दौड़ में दोनों के मस्तिष्क में अपने बच्चे कृष्णव के स्वास्थ्य और उसके बचपन की नींव की चिंता कहीं भी शामिल नहीं थी। 

कृष्णव जन्म के पश्चात से ही अनेकों बीमारियों से घिरा रहा। कुछ-कुछ समय अंतराल के पश्चात उसकी देखरेख करने के लिए आया परिवर्तित होती रही। दादी भी कृष्णव की मम्मी के साथ रही, पर उन पर शारीरिक अस्वस्थता भारी रही और उनके अनुभव का लाभ बच्चे की परवरिश में कहीं नहीं दिखा। हर दो से चार दिन में बच्चे को चिकित्सकीय सलाह की जरूरत होती थी। समय की पटरी को पार करते-करते कृष्णव चार साल का हो गया। माता-पिता निश्चिंत हो गए की अब तो स्कूल वालों की ज़िम्मेदारी है। हम तो अब पूर्णतया मुक्त है। पिता की चिंता केवल विडियो कॉल में ही दिखती थी। क्या खाया, क्या नहीं खाया इन सबका वृहद विश्लेषण होता था, पर लक्ष्मी अत्यधिक महत्वपूर्ण थी जिसके चलते उन्होने कभी भी यह नहीं सोचा की मैं कुछ समय नौकरी छोडकर बच्चे के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दूँ। माँ की सरकारी थी तो शायद उसे छोडना संभव नहीं था। दादी ने भी घोर कष्ट का सामना कर बच्चे की देखरेख करी। 

राधा ने कृष्णव की वर्तमान कराह को महसूस किया। उसके स्वास्थ्य की दुर्गति की कीमत भविष्य का धन संग्रह थी। मानसिक अस्वस्थता का सामना तो पूरा परिवार कर रहा था, पर एक मजबूत निर्णय की कमी थी। राधा सोच रही थी की हो सकता है की इतना कमाया हुआ धन भविष्य में काम भी न आए। इस पैसे की अंधाधुंध लड़ाई में कृष्णव के बचपन की ही पराजय हुई। वह हर समय शारीरिक अस्वस्थता से जूझता रहा। इस लघुकथा से यह शिक्षा मिलती है की यह बिल्कुल सत्य की बुरे वक्त में जब कोई काम नहीं आता तब संग्रह किया हुआ धन ही काम आता है, पर उस धन की कीमत कभी भी बचपन और शारीरिक स्वास्थ्य से बढ़कर नहीं होनी चाहिए। यदि बच्चे का बचपन ही खौखला है तो भविष्य की नींव कैसे मजबूत होगी। जीवन में धन के साथ सुकून और शांति का होना भी बहुत जरूरी है। कभी-कभी पैसे की मोहमया में वर्तमान की कराह सुनाई नहीं देती।   

डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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