साहित्य

विजयदशमी

हरप्रीत कौर

त्योहारों की रूत जो है आई
नवरात्रि ने भी धूम है मचाई
साथ विजयदशमी की
रौनक चहूं दिशा है छाई।

इक रावण का था वध हुआ
प्रतिदिन नये का जन्म हुआ
कहीं मंहगाई, कहीं हवस का
रावण समाज़ को निगलता हुआ।

सीता जी को बिन मर्जी
रावण ने था ना छुआ,
द्रौपदी के चीर हरण की
लाज रखने आए कन्हैया ।

बेबस मनुज क्यों इतना हुआ
तम निराशा का छाया हुआ
पुकारता करता फरियाद
रूप धर आए राम करता दुआ।
हरप्रीत कौर
कानपुर

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