साहित्य

विजय दशमी पर्व आया

वीणा गुप्त

इस बार दशहरे पर,
रावण के पुतले का,
दहन करने के लिए,
ज्यौं ही राम के किरदार ने,
फुलझड़ी बाण उठाया।
पुतले को निशाना बनाया,
पुतला रावण का तन गया।
अंगद के चरण सा जम गया।
बोला ऐंठ कर,
स्वर में कटाक्ष भर,
बहुत बार मुझे मार
और जला चुके तुम।
अब बाज आओ।
अपनी दोगली सोच पर
तरस खाओ।

मै तुम्हारे मारने से ,
नहीं मरूँगा ,न ही जलूँगा।
हाँ, अगर तुम ,
त्रेता वाले राम होते
तो खुशी से मर जाता।
भव सागर तर, मुक्ति पाता।
पर तुम्हारे जैसों को
हक नहीं है मुझे जलाने का।
गरेबान में झाँक देखो अपने,
कितना दम- खम है तुममें
राम कहाने का?
बताओ तो जरा ,

किस अहिल्या का तुमने ,उद्धार किया है।
कितनी सीता,आसुरी पंजों से बचाई हैं।
कौन से सुग्रीव से , मित्रता निभाई है।
किस निषाद को, गले से लगाया है।
किस शबरी की, जूठन खाई है।
पिता की ,कौन सी बात सुनी है तुमने?
किस भरत को, सहर्ष सत्ता थमाई है?
तुम्हारी कथनी और करनी पर
गिरगिट ने भी शर्म खाई है।

कोई एक बात तो बता,
जो राम से मेल खाती हो।
कहाँ शक्ति,शील,सौंदर्य के
प्रतिमान,मर्यादा वान श्रीराम।
कहाँ तुम अहंकार,अज्ञान से भरे,
कालुष्य की खान।
वैसे मैं भी इसी श्रेणी में आता हूँ ।
पर अपनी गलतियों को जानता हूँ ।
अपने को बार- बार धिक्कारा है।
तुम्हारी तरह मैंने पर,
अंतरात्मा को नहीं मारा है।

हाँ, अब ध्यान से सुनो
मेरी यह बात।
अब मेरा पीछा छोडो़ ,
मैं तो खुद ही पछता रहा हूँ
तभी तो सदियों से
तुम्हारे जैसों के हाथों
जलाया जा रहा हूँ।

तुम्हें न झेलनी पड़े ,
नियति मेरी,
इसलिए समझा रहा हूँ।
पहचानो,जानो,मारो,
अपने अंतर के रावण को,
बात खरी -खरी, बता रहा हूँ।

तभी सार्थक होगा
पूजन श्री राम का।
होगा सत्य,शिव का उत्थान।
तभी होगा अधर्म पर,
धर्म का जयगान।
तभी होगा यह पर्व, विजयदशमी का अर्थवान।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली
१४/९०/२०२१

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