साहित्य

विद्यार्थी जीवन

न पैसे की चिंता न फिक्र न कोई डर
बहुत आसान लगती है तब ज़िन्दगी की डगर
खाना खेलना मौज मस्ती करना नहीं कोई काम
बहुत कठिन हो जाती है राह चूक हो जाये थोड़ी अगर

पहले सब स्कूल पैदल ही आते जाते थे
रोटी के भी लाले थे रूखी सुखी खाते थे
बिजली की कोई व्यवस्था नहीं होती थी पढ़ने के लिए
लालटेन व दीपक की रोशनी से ही काम चलाते थे

फटे कपड़े होते थे नंगे पांव स्कूल जाते थे
स्कूल से लौट कर घर का सारा काम करवाते थे
खेलने के लिए कंचे,गुली डंडा,पत्थर मिट्टी होते थे
इन्हीं से खेलते खेलते बच्चे जवान हो जाते थे

उर्दू की क्लास नहीं भूलता वो दहशत का माहौल
गुरु जी के आते ही सबके हलक सूख जाना
प्रश्न पूछना न आना और गुरुजी का सबको मुर्गा बनाना
पीछे से ज़ोर ज़ोर से दस दस बेंत टकाना

आज बच्चे पैदल नहीं चलते गाड़ियों में स्कूल जाते हैं
खुद जेब में हाथ डालते हैं बस्ता मां बाप से उठवाते हैं
प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं अंग्रेज़ी में बात करते हैं
मातृभाषा हिंदी में बात करने से कतराते हैं

आज विद्यार्थी का जीवन हैं बहुत आसान
माता पिता पूरे कर देते है उसके सभी अरमान
चूक हो रही माता पिता से कहीं
जो दे नहीं पाते आज उसकी तरफ ध्यान

संस्कार भूल बैठे बच्चे जो थी भारत की शान
गुरुओं व बड़ों की न कोई इज़्ज़त न सम्मान
नशे की लत में लिपटी है आज हमारी युवा शक्ति
कैसे बनेगा मेरा यह भारत महान

रवींद्र कुमार शर्मा
घुमारवीं
जिला बिलासपुर हि प्र

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