साहित्य

विलुप्त हुये खत वो अहसास भी खत्म


लौटकर जिस तरह गुजरे जमाने
फिर वापस नहीं आते
उसी तरह खैरियत की खबर से भरे
शेरो-शायरी और बातों से सजे
खत अब नहीं आते
यादों के पिटारे में बंद हो गया
वह सुनहरा एक दौर
जहां पत्र ही एकमात्र माध्यम
बंधी हुई थी जिनसे रिश्तों की डोर
कुशल समाचार पाना हो
या किसी को खुशखबरी सुनाना हो
या फिर दिल का हाल बताना हो
कोरा कागज ही काफी था
जिसमें लिखी इबारत को पढ़ना
उसका प्रतिउत्तर उसी तरह
बिना शब्दों के देना
यह हुनर भी लोगों को आता था
कभी हाथ की कोई छाप
तो कभी आंसुओं की दो बूंद टपका
मिट गए अल्फाजों को यूं ही
प्रेषित कर दिया जाता
पढ़ने वाले को उसमें छिपा भाव
अपने आप समझ आ जाता
कहा-अनकहा सब समेट लेते थे
कोरे कागज अपने भीतर
उस कालखण्ड का इतिहास भी अक्सर
पत्रों के जरिये समझा जाता
हर्फों से भरे पन्ने ही नहीं
डाकिये से भी एक राब्ता बन जाता था
बन गया अतीत वह जमाना
जिसमें जिया कई पीढ़ियों ने जीवन
मन अहसासों को जीवंत रखा ।
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© ® सुश्री इंदु सिंह ‘इंदुश्री’
नरसिंहपुर (म.प्र.)

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