साहित्य

विश्वास के धागे

कहानी–

सीमा गर्ग मंजरी

अवि कार्यालय में जाने के लिए तैयार हो रहा था। पास खड़ी रितु के बालों को प्यार से सहलाते हुए बोला कि–
रितु आज शाम को माँ के साथ बाजार चली जाना अपने और दीदी के लिए बढ़िया सी साड़ी ले लेना। पूरे सात साल की तपस्या के बाद मेरी प्यारी दीदी रक्षा बँधन पर राखी बाँधने घर आ रही हैं।
“अच्छा ठीक है।”

किंतु,” यह तो बताइए! कि दीदी सात साल से अपने घर क्यों नहीं आ रही थी। वह हमारी शादी में भी शामिल नहीं हो सकीं थीं। “
“शहर के नजदीक रहकर भी मायके से इतनी लंबी दूरी बना रखी है दीदी ने ज़रूर इन सबके पीछे कोई गहरी बात छिपी है ।”
अपने दोनों होंठों को गोल घुमाकर रितु कुछ सोचते हुए अवि से बोली थी।

रितु और अवि इन दोनों की शादी अभी पिछले साल हुई थी ।
इन दो भाईयों की लाडली इकलौती बहन रचना थी।
पिताजी ने अपनी लाडली बेटी का विवाह शहर में नजदीक ही यह सोचकर किया था, कि हफ्ते दो हफ्ते में मायके में वो मायके में मिलने आती जाती रहेगी।

यह सोचकर अवि के पिताजी ने अपने ही शहर में अच्छे पढ़ें लिखे खुद का व्यापार करने वाले लड़के से रचना का विवाह किया था।

कुछ दिन तो हँसी खुशी में समय पँख लगा कर उड़ गया।
परन्तु धीरे धीरे समय बीतने के साथ ही रचना के ऊपर उसकी ननद सास की रोक टोक बढ़ने लगी।
अब घर के काम झाड़ू-पोछा से लेकर रसोईए के हाथ के भी सभी काम काज रचना के सुपुर्द कर दिये गए।

दस पाँच नौकर नौकरानियों वाले बड़ी हवेली जैसे शाही महल में अब सब नौकरों-चाकरों को छुट्टी दे दी गई। जो सारे काम पहले नौकर चाकर करते थे अब वे सारे काम रचना के कँधों पर आ पड़े। रचना बेचारी काम के बोझ तले दबती चली गई।

उसका गोरा कुंदन सा चमकता रंग मैला पड़ने लगा।
फ़ूल सा खिला चेहरा मुरझा गया। आँखों के नीचे काले गड्ढें उभर आये, जिन पर स्याह घेरे और गहरे चमकने लगे।
एक दिन पिताजी दीदी से मिलने पहुँचे तो रचना घर के हाॅल में पोंछा लगा रही थी पिताजी को देखते ही उनके गले से लिपट कर फूट फूट कर रो पड़ी।

पिताजी को सपने में भी ऐसा गुमान नहीं था कि उनकी इकलौती बेटी के साथ इतने बड़े ऊँचे खानदानी रईस इतना बुरा बर्ताव कर सकते हैं।
पिताजी ने दीदी के सास ससुर से बात की तो उन्होंने पिताजी को खरी खोटी सुना दी।
” तुम्हारी लड़की बाँझ है।”
” ऐसी ठूँठ बुद्धि के लिए बुद्धि हीन लड़का ढूँढकर इसकी दूसरी शादी कर दो।”
“वरना तो हमारे यहाँ पर जैसा हम चाहते हैं वैसे ही इसे हमारे हिसाब से रहना होगा।”
“आपको यदि बहू बेटी का घर के काम काज करना बुरा लगता है इस खोटे सिक्के को अपने घर बिठाकर रखिए।”
ताना मारते हुए कर्कश स्वभाव वाली
दीदी की सास माँने पिताजी के साथ दीदी को विदा कर यहीं पर भेज दिया था ।
अपने कर्त्तव्य कर्म में धर्मभीरू जीजाजी अपने माता-पिता से डरने वाले निकले। वे दीदी के हित में कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे।
अपने माता-पिता के सामने कुछ भी बोलने के नाम पर उनकी जुबान तालू से चिपक कर रह जाती।
अतः दीदी के बाँझ होने की बात सुनकर पिताजी खून का घूँट पीकर अपना और दीदी का अपमान मौन बर्दाश्त कर दीदी को घर पर ले आये।

परन्तु लाड़ली दीदी के हाल बेहाल हो जाने के गम ने पिताजी को हमसे छीन लिया और एक दिन मेजर हार्ट अटैक के चलते वो इस संसार से विदा होकर चले गए।
पिताजी के चले जाने के बाद हम दोनों भाइयों ने राखी के त्योहार पर दीदी की राखी नम आंखों से बँधवाई तो तभी हमने कसम खाई कि हम दीदी को उसका अधिकार दिलवाकर रहेंगे। उसके दोनों भाई अभी जिंदा हैं।
हम इन विश्वास के अनमोल धागों की कीमत उसके ससुराल वालों को अवश्य ही बता कर रहेंगे। तब हमने अपने पैरों पर खड़ा करने में समर्थ बनाने के लिए दीदी को आगे पढाने का फैसला किया।

हम दोनों भाइयों ने मिलकर दीदी की पढ़ाई रहने खाने का सारा खर्चा उठाया। दीदी ने भी अपनी जिंदगी के कीमती सात साल कुर्बान करते हुए इस शहर से दूरी बना ली। और कसम उठाई कि–
“जब तक कुछ बन नहीं जाऊँगी तब तक इस शहर में कदम नहीं रखूँगी।”

तब दीदी ने महिला होस्टल में रहकर अपनी छूटी पढ़ाई पूरी की । उसके साथ पी. सी. एस. की परीक्षा को पास किया।
आज मेरी दीदी के पास सारे सुख ओशो आराम हैं। आज दीदी सरकारी नौकरी में राजपत्रित अधिकारी हैं।

कुछ दिन पहले दीदी का फोन आया था तो वो कह रही थी कि–
“तेरे जीजाजी सच में अब बहुत शर्मिन्दा हैं।”
“इस त्योहार पर रक्षा बँधन वाले दिन ससुराल वालों ने उन्हें इज्जत मान सम्मान के साथ ससुराल में बुलाया है ।”
अब ससुराल से मान सम्मान मिलने के साथ जीजाजी के साथ आकर वे हमें राखी बाँधने आने वाली हैं।

✍ सीमा गर्ग मंजरी।
मौलिक सृजन।
मेरठ कैंट उत्तर प्रदेश।

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