कवितासाहित्य

विषय पाश्चात्य संस्कृति और बदलता परिधान

चंद्रकला भगीरथी

भारतीय संस्कृति को हम भूल गए हैं।
पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने लगे हैं।

कैसा ये मौसम और हवा चली है।
इसका न कोई रुप रंग न शक्ल है।।

पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठकर।
सूर्य नमस्कार करते थे।।

माता पिता के चरणों को छू।
सभी पूजा पाठ करते थे।।

अब तो सुबह उठकर।
गुड मार्निग होती है।।

हाथ मुह धोने की जगह।
बैड टी बिस्तर पर होती है।।

पहले नर और नारी परिधान पहनते थे।
पूरे शरीर को ढक कर जीवन यापन करते थे।।

अब तो कोई भी उम्र हो।
तंग व कम वस्त्र पहनते हैं।।

चलते हैं चटक मटक वो।
बाल खोल मुंह पर काला चश्मा रखते हैं।।

पहले कोई मिलता था जब रास्ते में।
राम राम जी भाई प्रणाम जी कह हाथ जोडते थे।।

अब तो देखो भैया हाय हैलो होती है।
गुड मार्निग बाय बाय टाटा से बात बनती है।।

चन्द्रकला भागीरथी धामपुर जिला बिजनौर उतर प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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