साहित्य

वैष्णवी रूप में पूजी जाती है माता दूनागिरी


सच्चे मन की हर मनोकामना करती पूरी माँ दूनागिरी

भुवन बिष्ट

  इस समय पावन नवरात्रों की चारों ओर धूम मची है।माता के मंदिरो में भक्तों की भीड़ लगी है। देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही देवों की तपोभूमि रहा है, इस कारण यह अटूट एंव अगाध आस्था का केन्द्र भी रहा है। नवरात्रों में मंदिरों में और अधिक चहल पहल एंव भीड़ बढ़ जाती है। देवभूमि में आध्यात्मिक धार्मिक व पर्यटन की दृष्टि से विश्वविख्यात है वहीं यह प्रसिद्ध मंदिरों धार्मिक स्थलों के लिए भी विशेष पहचान रखती है । अटूट अगाध आस्था श्रद्धा का संगम देखने को मिलता है पावन देवभूमि में । द्वाराहाट नगर से लगभग पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मां सिंहसवारी, वैष्णवी शक्ति पीठ माता दूनागिरी का भव्य मंदिर। सड़क से सैंकड़ो सीढ़ीयां चढ़कर पहुंचते हैं माता दूनागिरी के दरबार में। दूनागिरि माता का भव्य मंदिर बांज, देवदार, अकेसिया और सुरई समेत विभिन्न प्रजाति के पेड़ों के झुरमुटों के मध्य स्थित है, जिससे यहां आकर मन को काफी शांति मिलती है। सच्चे मन से मांगी गयी हर मुराद पूरी करती है मां दूनागिरी । पुराणों के अनुसार दूनागिरी पर्वत को द्रोणांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है । माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना लगभग सन् 1183 में हुई थी । मां दूनागिरी का मंदिर रमणीक , एकांत स्थान पर बना है जिससे यहां आने पर मन को शांति अनूभूति होती है । यहां आसपास के अलावा दूर दूर से भी श्रृद्धालु मां दूनागिरी के दर्शन को आते है नवरात्रों में यहां लंबी लंबी कतारें मां दूनागिरी के दर्शन को लगी रहती है अगाध आस्था के कारण मां दूनागिरी के दरबार में सदैव ही भक्तों की भीड़ रहती है । पौराणीक कथा के अनुसार त्रेतायुग में लंका में लक्ष्मण को शक्ति लगने पर सुषैन वैद्य ने हनुमान जी को संजीवनी बूटी लेने को द्रोणांचल पर्वत पर भेजा। हनुमान जी पर्वत को लेकर जा रहे थे तो पहाड़ी से दो शिलाएं गिर गई। इनका ब्रह्मचरी नाम पड़ गया। 1238 ईसवी में कत्यूर वंशीय राजा सुधारदेव ने मंदिर का लघु निर्माण कर मूर्ति स्थापित की। यह भी माना जाता है कि इस पर्वत पर पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य द्वारा तपस्या करने पर इसका नाम द्रोणागिरि भी है। देवभूमि उत्तराखण्ड के दूनागिरी में वैष्णवी रूप में पूजी जाने वाली माँ दूनागिरी का भव्य मन्दिर अपार आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ माँ दूनागिरी वैष्णवी रूप में पूजी जाती है। इस धाम में वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है। मंदिर में अखंड ज्योति का जलते रहना इसकी एक विशेषता है। माता को वैष्णवी रूप में पूजा जाता है । भक्तों की अटूट अगाध आस्था के अनुसार माँ वैष्णवी संतान प्राप्ति हेतु मंदिर में अखंड दीपक जलाकर तपस्या करने वाली महिला को मां संतान सुख प्रदान करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में सोने और चांदी के छत्र, घंटियां, शंख चढ़ाते हैं। मंदिर में चढ़ी हजारों घंटियां मां वैष्णवी की अगाध आस्था का प्रतिक है । मां दूनागिरी के भव्य मंदिर से प्राकृतिक सौंदर्य की भी अनुपम छटा के दर्शन होते हैं । पुराणों, उपनिषदों व इतिहासविदों ने दूनागिरि की पहचान माया-महेश्वर या प्रकृति-पुरुष व दुर्गा कालिका के रूप में की है। दूनागिरी में स्थापित इस मंदिर में वैसे तो पूरे वर्ष भक्तों की कतार लगी रहती है, मगर नवरात्र में यहां मां दुर्गा के भक्त दूर- दराज से बड़ी संख्या में आशीर्वाद लेने आते हैं। देवी पुराण के अनुसार अज्ञात वास के दौरान पांडवों ने युद्ध में विजय तथा द्रोपदी ने सतीत्व की रक्षा के लिए दूनागिरि की दुर्गा रूप में पूजा की तथा मां दुर्गा मां दूनागिरी का आशीर्वाद लिया । द्वापर युगी पांडवों का अज्ञातवास भी दूनागिरी क्षेत्र के पांडवखोली में बीता। दूनागिरी से कुछ ही दूरी पर रमणीक स्थान व ऊंची पहाड़ी में है पांडवखोली, जहां भीम की गुदड़ी के नाम से एक बड़ा मैदान है। मां दूनागिरी का मंदिर भव्य एंव आकर्षक है । सच्चे मन से मांगी गयी हर मुराद वैष्णव रूपी मां दूनागिरी पूरी करती है । मां के दरबार में होता है आस्था, श्रद्धा, का अटूट संगम । देवभूमि की पावनता का सदैव होता है गुणगान , जहां हर पग पग होता है आस्था का संगम । मनवांछित फल देने वाली मां दूनागिरी के दरबार में जो भी भक्त सच्चे मन से आता है सच्चे मन की हर मनोकामना करती है पूरी वैष्णव रूपी मां दूनागिरी।

भुवन बिष्ट, रानीखेत, उत्तराखंड

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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