साहित्य

शरद पूर्णिमा और महारास लीला

मीना माईकेल सिंह

शरद पूर्णिमा के दिन वर-वंशिका के धुन से गोपियों संग महारास लीला रचाई थी,
सुन मुरली की तान राधा संग गोपियां भी सुध बुध खोकर कृष्ण खूब रास रचाई थी।

शरद की पूर्णिमा को चंद्रमा भी अपने प्रखर रूप सबको दिखलाया था,
एक रात को कृष्ण की माया से छः मास का एहसास कराया था।

सुध-बुध खोई गोपियां छोड़ गृह के कर्मों को कृष्ण संग रास रचाने आई थी,
राधा भी कृष्ण संग पावन पूर्णिमा में तन्मय हो महारास लीला में छाई थी।

देख शरद पूर्णिमा की अद्भुत महारास लीला शिव भी ठहर नही पाए थे,
छोड़ आसन अपना देखने महारास लीला वे वृंदावन की भूमि पर आए थे।

परम और चरम की अद्भुत यह लीला भाव- विभोर कर अध्यात्म का अनुभव करती है,
आत्मा -परमात्मा के परम मिलन से यह ब्रमांड भी नत शीश हो शत-शत नमन करती है।

स्वरचित-मौलिक रचना
मीना माईकेल सिंहमीना माईकेल सिंह
कोलकाता

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