साहित्य

शहर में आवारा पशुओं की समस्या

डॉ.सारिका ठाकुर “जागृति”

लेकिन प्रशासन इसे लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं दिख रहा। आए दिन आवारा पशुओं की चपेट में आकर निर्दोष लोग अपने हाथ-पैर तुड़वाने और जान से हाथ धोने तक को मजबूर है ।
शहर का ऐसा कोई मार्ग या चौराहा नहीं, जहां आवारा पशुओं का विचरण नहीं होता हो। स्थिति यह बन गई है कि छोटे बच्चों का तो घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया है। शहर के मुख्य मार्गों पर झुंड बनाकर घूमते आवारा पशुओं के कारण राहगीरों वाहन चालकों को हमेशा आशंका लगी रहती है। शहर की सड़कों पर आवागमन करने वाले वाहन चालकों के अचानक आवारा पशु सामने आने से वाहनों को टक्कर मार देने से कई वाहन चालक चोटिल हो चुके हैं।

मुख्यमार्गों पर उन्मुक्त विचरण करते इन आवारा पशुओं के कारण मार्ग पर आवागमन करने के दौरान राहगीरों वाहन चालकों को हरदम हादसा होने की आशंका लगी रहती है। मार्ग पर लड़ते पशुओं की वजह से कई बार शहरवासी चोटिल होने के साथ उनके वाहन भी क्षतिग्रस्त हुए हैं।

बाजार में उन्मुक्त विचरण इतना बढ़ गया है कि शहर की एक भी ऐसी गली या मोहल्ला नहीं है, जहां आवारा पशुओं का विचरण नहीं हो रहा है। मुख्य मार्गों पर झुंड के झुंड बनाकर आवारा पशु बैठे रहते हैं। शहर की मुख्य सडको, बस स्टैंड, सब्जी मंडी, छतरियों का मोर्चा सहित मुख्य मार्गों पर दिन भर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है। मुख्य मार्गों पर इन पशुओं का जमावड़ा लगा रहने के कारण आम आदमी का मार्ग से गुजरना मुश्किल हो गया है।

नगरपरिषद प्रशासन इससे भलीभांति वाकिफ है, मगर इसका समाधान नहीं हो रहा, किन्तु नगरपरिषद प्रशासन ने आवारा पशुओं की धरपकड़ के कोई प्रयास नहीं कर पाया है आइए जानते है पीछे के क्या कारण हो सकते है।

१.योजनाओ का बनना और फाइलों में दब जाना –

आवारापशुओं की समस्या से शहरवासियों को निजात दिलाने के लिए जनप्रतिनिधियों शहरवासी को कई बार नगरपरिषद प्रशासन को अवगत करवाने के बावजूद धरपकड़ की कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
कभी कभार एक-दाे दिन के लिए अभियान चलाकर इतिश्री कर दी जाती है। ठोस कार्रवाई नहीं होने से स्थिति जस की तस बनी हुई है। पूर्व में कई बार आवारा पशुओ की समस्या के समाधान को लेकर योजनाएं बनाई गई, लेकिन नगरपरिषद प्रशासन उसे अमलीजामा पहनाने में नाकाम रहा।

२.कांजी हाउस को बना दिया कबाड़खाना –

नगरपरिषद के पास आवारा पशुओं को पकड़कर रखने के लिए कांजी हाउस की सुविधा है, लेकिन उसका इस्तेमाल ही नहीं हो रहा है। हालांकि कुछ महीनों तक एक संस्था ने इसका जिम्मा उठाया, लेकिन कुछ महीनों पूर्व नगरपरिषद ने इसे खाली करवा दिया। अब नगरपरिषद उसे कबाड़ रखने के लिए काम में ले रही है।

३.सरकार से नहीं बजट का प्रावधान –

नगरपरिषद आवारा पशुओ को पकड़कर रख तो लेगी, लेकिन उनके चारे-पानी की व्यवस्था नहीं कर सकती है। क्योंकि सरकार से इस बाबत बजट का प्रावधान नहीं है। ऐसे में अगर कोई सेवाभावी संस्था इसके लिए तैयार हो जाए तो जल्द ही इस समस्या से शहरवासियों को निजात मिल सकती है।

४.‘गौरक्षा’ का बहाना –
‘गौरक्षा’ के बहाने जहां आवारा पशुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, भीड़ तंत्र समाज में आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। विश्व में, विशेषकर प्रगतिशील देशों में आवारा पशु नाम की समस्या का जिक्र करना भी हास्य का पात्र बनना है मगर आजकल भारत में यदि गऊ तथा इंसान की हत्या के संदिग्ध दोषियों में से अधिक कसूरवार ठहराने का सबब बन जाए तो ‘गऊ हत्या’ का दोषी अधिक खतरनाक समझा जाता है।
आवारा पशुओं की सेवा-सम्भाल के लिए सरकार अथवा समाजसेवी/ धार्मिक संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही गौशालाएं, कांजी हाऊस आदि में से अधिकतर में पशुओं की हालत अत्यंत दयनीय है। आवश्यक खुराक, दवा तथा सफाई की कमी के कारण बड़ी संख्या में पशु मर जाते हैं।

५.समाज तथा सरकारों की जिम्मेदारी –
यह जिम्मेदारी सरकारों तथा सारे समाज की है कि वे आवारा पशुओं के कहर से आम लोगों को बचाएं। इनकी सेवा-सम्भाल के लिए पूरी व्यवस्था की जाए या किसी भी ढंग से सामान्य लोगों को आवारा घूमते पशुओं से छुटकारा दिलाया जाए। सम्भालने वाले पशुओं में से उन पशुओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो दूध देने योग्य हों अथवा आगे अपनी वंश वृद्धि करने में सक्षम हों। इसके अतिरिक्त यदि आवारा पशुओं को खेतीबाड़ी से जुड़े या ढुलाई जैसे अन्य कार्यों में इस्तेमाल किया जा सके तो उनकी देखभाल की जानी चाहिए। एक ऐसे देश में जहां हर वर्ष हजारों लोग भूख से मरते हों, गरीब के लिए घर के गुजारे हेतु पालतू पशुओं के लिए चारा मोल लेना भी मुश्किल हो, वहां बड़ी संख्या में अनावश्यक आवारा पशुओं की हरे चारे से पेट भरने की व्यवस्था करना मुश्किल है।

बेशक हिन्दू धर्म में गऊ को आदर से देखा जाता है। गैर-हिन्दुओं द्वारा भी गऊओं से मिलने वाले अमृत रूपी दूध तथा उनके शावकों का कृषि व ढुलाई में इस्तेमाल करने के कारण इन्हें ‘गौधन’ के नाम से पुकारा जाता है। प्रश्र किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है लेकिन यदि धार्मिक आस्था के परिणामस्वरूप आवारा पशु लोगों के लिए जानलेवा बन जाएं,तो निश्चित तौर पर आवारा पशुओं के मुकाबले इंसानों की कीमती जानों की रक्षा की जानी चाहिए। जो कारण इंसान की मौत की वजह बनता हो उसको कभी भी ‘पुण्य’, ‘शुभ कार्य’ या परमात्मा को खुश करने वाली ‘मन्नत’ नहीं कहा जा सकता।
यदि गऊओं की तरह अन्य आवारा पशुओं तथा जानवरों को भी बाजारों तथा खेतों में घूमने की छूट मिल जाए तो समाज का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। आवारा पशुओं से छुटकारा पाने के उपाय को किसी भी धर्म या धार्मिक आस्था से नहीं जोडऩा चाहिए और न ही ऐसे मुद्दों पर वोटों की राजनीति की जानी चाहिए। बेवजह जंगलों की कटाई के कारण जंगली जानवरों (जैसे हाथी, शेर, बंदर, चीते आदि) द्वारा रिहायशी क्षेत्रों में आकर लोगों पर हमले करना तथा रेल पटरियों पर ट्रेन से कट कर मरने की घटनाएं पहले ही सभी की चिंता का विषय बनी हुई हैं। इन चिंताओं, जो मनुष्य ने खुद पैदा की हैं, को हल करने की जरूरत है। कम से कम आवारा पशु तथा कुत्ते तो लोगों के लिए जानलेवा साबित न हों। हमारी सरकारों का स्वभाव मुसीबत आने पर ही जागने का बन गया है। यही हालत आवारा पशुओं के मामले में भी है। समाज के सांझे जख्मों को धर्मों या आस्था के चश्मे से देखने की बजाय पीड़ा महसूस करने की जरूरत है।

डॉ.सारिका ठाकुर “जागृति”
लेखिका, कवियत्री, शिक्षिका, समाजसेविका
ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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