साहित्य

शहीद बैकुंठ शुक्ल और भगत सिंह की फांसी का बदला

  • विश्वजीत शेखर राय
    सलेमगढ़, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

आज भारत अपने आज़ादी का अमृत महोत्सव मन रहा है। इस महोत्सव में हम लोग अपने देश की आज़ादी के लिए बलिदान देने वाले और संघर्ष करने वाले वीरों को नमन कर रहे है। इस अमृत महोत्सव के माध्यम से हम लोग विस्मृत नायकों को समाज के स्मृति पटल पर पुनः जीवित कर रहे है और उन्हें उनके त्याग, बलिदान एवं साहस के लिए नमन कर रहे है। इसी क्रम में यह लेख युद्ध और बुद्ध दोनों को अपने पालने में पलने वाली गौरव भूमि बिहार के तत्कालीन मुजफ्फरपुर जनपद (वर्तमान वैशाली) के उस नौजवान को समर्पित है जिसने शहीद-ऐ-आजम भगत सिंह के खिलाफ गवाही देकर फांसी की सजा दिलवाने वाले विश्वासघाती की हत्या कर के बिहार के ऊपर लगा द्रोह का कलंक मिटा दिया। इस अमर बलिदानी का नाम बैकुंठ शुक्ल था। इनका जन्म 15 मई, 1907 को पुराने मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) के लालगंज थानांतर्गत जलालपुर गांव में हुआ था। उनके पिता राम बिहारी शुक्ल किसान थे. इनके चाचा योगेन्द्र शुक्ल हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य रहे, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण काला-पानी की सजा पाए और आजाद भारत में बिहार विधान परिषद के मनोनीत सदस्य रहे। बैकुंठ शुक्ल को देश प्रेम और क्रांति का पाठ घर पर ही बाल्यावस्था से देखने – सीखने को मिला था।

हिन्दुस्तान को अंग्रेजों के शासन से मुक्त कराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश तथा बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों द्वारा सन् 1924 में कानपुर में लाला हरदयाल के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नामक संगठन की स्थापना हुई। लेकिन काकोरी काण्ड के पश्चात् जब चार क्रान्तिकारियों को फाँसी दी गई और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सोलह प्रमुख क्रान्तिकारियों को चार वर्ष से लेकर उम्रकैद की सज़ा दी गई तो यह संगठन छिन्न-भिन्न हो गया। कुछ समय पश्चात् चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर इस संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और इस के लिए सन 1927 में भगत सिंह बेतिया फणीन्द्र नाथ घोष के घर पहुंचे। बेतिया में अलग-अलग क्रांतिकारियों के घर कई दिन रहें। तत्पश्चात भगत सिंह, योगेन्द्र शुक्ल से मिलने वैशाली चले गए। इसके बाद 8-9 सितंबर, 1928 को भगत सिंह की अध्यक्षता में दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला के खंडहरों में क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय बैठक बुलाई गई। इसी बैठक में संगठन को एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। बिहार का कमान फणीन्द्र नाथ घोष को सौंपा गया और योगेन्द्र शुक्ल भी संस्थापक सदस्यों में रहे।

आगे चलकर यही इसी फणीन्द्र नाथ घोष सरकारी गवाह के तौर पर आज़ाद के शव की शिनाख्त की थी और सरकारी गवाह के तौर पर सैण्डर्स-वध कांड और असेम्बली बम कांड में भी अपनी गवाही दी और इसी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को आरोपी बनाकर उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई। बिहार के इस क्रांतिकारी के मुखबिर बन जाने से देश भर के क्रांतिकारियों ने बिहार को लानत भेजा और बिहार के सामने दो विकल्प रखे कि ढोओगे या घोओगे ? योगेन्द्र शुक्ल व गुलाब चन्द्र गुलाली ने कलंक धोने का निश्चय किया और इस क़सम को पूरा करने की ज़िम्मेदारी योगेन्द्र शुक्ल के भतीजे बैकुंठ शुक्ल ने अपने कंधों पर ले ली। इनका साथ देने को चन्द्रमा सिंह तैयार हुए। 1932 में ही शीत ऋतु में हत्याकांड को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया गया। 9 नवम्बर, 1932 को बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह ने बेतिया के मीना बाजार में खुखरी से फणीन्द्र की हत्या कर दी। घटना स्थल पर मिले कुछ सबूतों के आधार पर पुलिस ने बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह को अभियुक्त बना कर जाँच करना प्रारम्भ किया और कुछ अन्य क्रांतिकारियों के पास बरामद हुए दस्तावेजों से पुलिस का शक यकीन में बदल गया कि फणीन्द्र की हत्या बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह द्वारा ही की गई है।

14 मई, 1934 को गया में बैकुंठ शुक्ल फांसी के तख्ते पर हंसते-हंसते शहीद हो गए। उनकी धर्मपत्नी राधिका देवी भी उनके पथ पर चलती हुए 1942 के आंदोलन में जेल गई। लेकिन दुख की बात है कि आजादी के 75 वर्ष के बाद भी ऐसे क्रांतिकारी के जीवन वृत पर किसी इतिहासकार ने यथोचित प्रकाश नहीं डाला भारत के आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर हम उनकी शहादत को हम शत-शत नमन करते हैं।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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