कवितासाहित्य

शायद एक लड़की होना आसान नहीं है!

इस दुनिया को तुम्हें दिखाऊं…
चलो तुम्हें कुछ बातें बताऊ…
इस दुनिया के सच से तुम्हें वाकिफ कराऊं…
जब पैदा हुआ ना तब मैं इंसान था…
क्या होता लड़का-लड़की इसका मुझे कहा ज्ञान था…
लड़कियों पर बंधी बेड़िया कई इसका मुझे कहा अनुमान था…
इन बातों से तब मैं बिल्कुल ही अनजान था…

ऐसे ही थोड़ी बनती हैं लड़की…
उसके लिए घुटना भी पड़ता है…
घोट गला खुद अपने सपनों का…
उन्हें रोकना खुद को ही पड़ता है…
ऐसे थोड़ी बनती हैं लड़की…
उसके लिए झुकना भी उसको ही पड़ता है…

आखिर ऐसा कब तक चलेंगा…
कहने को हैं, २१ वी सदीं उसके लिए बस, वरना आज भी उसे कपड़ो से जज किया जाता है…
आज देश ने इतनी तरक्की की है हर बात में…
मुझे अफसोस है इस बात में हमारा देश कहीं कायदे के मामले पीछे छूट गया…
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ये बातें तो सिर्फ कहने की बातें रह गयी,

ऐसा नहीं है कि वो अपनी लड़ाई खुद लड़ नहीं सकती है…
परतुं अपने परिवार के इज्जत खातिर छुप रहना पड़ता है…
शायद एक लड़की होना आसान नहीं है;

अक्सर सोचती हूं कि ये कैसा समाज हैं….
ये जितना बुरा कल था, शायद उससे भी ज्यादा बत्तर आज हैं…
अपनी सोच बदलो, नज़रिया बदलो, नजारा खुद-ब-खुद बदल जाएगा…
सपने उसके भी बहुत होते हैं… उसे भी खुले आसमान में उड़ने का एक तो मौका दे दो!
-Pranali Bhinge
Mumbai

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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