साहित्य

!शिखा!


शिखा हूँ मैं,
मंजिल के शिखर पर चढ़ जाऊँ।
गर सामना मुश्किलों से हो तो,
हौसलों से जीत लूँ सारी जंग।
हँसते हँसते हुए,
हर बाधा पार
कर लूँ मैं।
शिखा हूँ मैं,
चढ़ जाऊँ मंजिल के शिखर पर।

माँ -पापा की लाडली बिटिया हूँ मैं,
बुढ़ापे की लाठी बन जाऊँ मैं।
दादी दादा के चेहरे की खुशियाँ हूँ मै,
हर हरदम छाया बनकर रहूँगी।
बहनों की जान हूँ मैं,
चोट लग जाएँ जो मुझे,
बहनों की आह निकल जाती है।

भाइयों की कलाई की डोर हूँ मैं,
जिदंगी भर साथ दूँगी मैं।

जो कहते हैं बिटिया बोझ होती है,
उनको कामयाब बनके दिखाऊँगी।
बेटी हूँ, बेटा बनकर भी दिखाऊँगी।

शिखा हूँ मैं,
शिखर पर चढ़ जाऊँगी।
मंजिल की राह में काँटे मिलें या पत्थर,
हर राह चलकर पार कर लूँगी।

बेटी हूँ कमजोर नहीं
अपने परिवार की ताकत बनकर
दिखाऊँगी।
शिखा हूँ मैं,
शिखर पर चढ़ जाऊँगी।

स्वरचित
मृदुला कुशवाहा
गोरखपुर

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