कवितासाहित्य

. शीर्षक: दर्द

बिमल काका गोलछा “हँसमुख”

बेटी थी मैं जिस घर की,
झूठा लाड लडाया मुझको।
उनकी आंख का तारा हूं,
कहकर भरमाया मुझको।।

किसको कहूं मेरा अपना,
यह बात नहीं समझ पाई।
विदा जिन्होंने किया मुझे,
या गैर वो जिसने अपनाई।।

तोड़कर नाता अपनों से मैं,
किसी गैर को है अपनाया।
अपनी ख्वाहिशें दफन कर,
सपनों को उस संग सजाया।।

सबके आंसू पोछकर मैनें,
अपने आंसू सबसे छुपाए।
सास ससुर देवर ननद को,
सबको दिल में मैंने बसाए।।

खट्टे मीठे सबके ताने सुन,
खामोश बुत सी बनी रहूं।
मर्यादा में रहना जो सीखा,
हर बात उनकी सुनती रहूं।।

ना हूं मैं इतनी परिपक्व सी,
फिर भी सब बात समझू मैं।
बेटी से बहू बनकर भी यहां,
इस घर को अपना समझू मैं।।

टूटते बिखरते है सपने मेरे,
लिखती रहूं मैं दर्द अपना।
ना दिया मैंने दर्द किसीको,
सीखा मैंने दर्द को ढकना।।

पहले भाई और बहनों पर,
कितना प्यार लुटाती थी मैं।
अब जीवन “हँसमुख” ऐसा,
खुशी से खुद लूट जाती मै।।

बिमल काका गोलछा “हँसमुख”
श्रीडूंगरगढ़ (बीकानेर) राजस्थान

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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