साहित्य

समीक्षा:विलोल वीचि वल्लरी

समीक्षक: डॉ राकेश जोशी

संग्रह का नाम: विलोल वीचि वल्लरी
कवयित्री: पल्लवी मिश्रा
प्रकाशक: देवभूमि विचार मंच प्रकाशन, देहरादून (उत्तराखंड)
प्रथम संस्करण: 2021
आईएसबीएन: 978-81-952888-3-0
मूल्य: ₹120

युवा कवयित्री पल्लवी मिश्रा का काव्य-संग्रह ‘विलोल वीचि वल्लरी’ अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है। ‘शिव तांडव स्तोत्र’ के श्लोक-
“जटा कटाह सम्भ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी
विलोल वीचि वल्लरी विराज मान मूर्धनि”-
से लिया गया संग्रह का नाम ही अपने-आप में इस संग्रह के बारे में बताने के लिए पर्याप्त है। उनकी कविताएं भी गंगा की तरह निर्झर बहती हुई दुनिया को निर्मल करने हेतु निरंतर प्रयासरत रहने की आकांक्षा का प्रतीक हैं।

पल्लवी मिश्रा की कविताएं आम-जन की कविताएं हैं। ये कविताएं इसी समाज से उपजी हैं। इन कविताओं में पल्लवी मिश्रा इसी संसार में रहकर इस संसार को बेहतर देखने और बनाने के लिए कृत-संकल्प लगती हैं। उनकी कविताएं एक नया संसार रचती हैं, जिसमें आम आदमी के जीवन का कठिन संघर्ष, दु:ख-दर्द, पीड़ा, आक्रोश, विद्रोह- सब एक साथ- प्रकट होते हैं। वे लड़ने में विश्वास रखती हैं- अपने आप से- जीवन की स्थितियों से- समाज से- दुनिया से- व्यवस्था से, हर उस स्थिति से- हर उस व्यक्ति से, जो धरती पर मनुष्य के जीवन को कठिन से कठिनतर बनाने के लिए जिम्मेदार है।

इन कविताओं में युगबोध है- यथार्थ है- प्रेम है- उम्मीद है- निराशा है- क्रोध है- क्षोभ है- व्यंग्य है- विडंबना है- प्रेम है- प्रकृति है- इतिहास है-वर्तमान है, इसलिए ये कविताएं इस धरती पर मनुष्य के दु:ख-दर्द और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज हैं। ये कविताएं मनुष्य और प्रकृति के एकाकार हो जाने की स्थिति हैं। इन कविताओं में एक अदृश्य-सा क्रोध- एक अदृश्य-सा विद्रोह है, जो व्यवस्था से मोह-भंग हो जाने पर प्रकट होता है। यह समाज की विद्रूपता से उत्पन्न होने वाली निराशा है, पर यह निराशा विध्वंसकारी नहीं, सर्जनात्मक है।

पल्लवी मिश्रा के अनुसार- “कविताएं मेरे होने और न हो पाने के अनगिनत अभिलेखों पर एक सुनिश्चित हस्ताक्षर हैं”। इस संग्रह की पहली ही कविता ‘मेरे जैसे लोग’ में वे अपने इसी अस्तित्व की- अपने इसी होने की उद्घोषणा इन शब्दों में करती हैं:

ऐसी ही किन्हीं रातों में
मुझ जैसे लोग
चाँद के ऊपर लगा
“चंद्रबिंदु” होते हैं।

मेरे जैसे लोग
तुम्हारे देव-स्थान में रखा
वह दक्षिणवर्ती शंख
जिसके भीतर
गूंजता है समुद्र का अथाह-गान।
जिसे कानों से लगा
नहीं सुना गया कभी।

(पृष्ठ: 12-13)

पल्लवी मिश्रा की कविताएं एक स्त्री के मन की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति-मात्र नहीं हैं, बल्कि ये सदियों से दमित और पीड़ित स्त्री के विद्रोह और आक्रोश का प्रतीक हैं। उनकी कविताएं किसी काल्पनिक संसार की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि कठोर यथार्थ की भूमि पर खड़ी एक स्त्री के आक्रोश की हुंकार हैं। ये कविताएं इस दुनिया को एक स्त्री की दृष्टि से देखने का प्रयास हैं।

पल्लवी मिश्रा की कविताएं समाज की उन विसंगतियों और असमानताओं से उत्पन्न हुई हैं, जो स्वयं अपने आप-में व्यवस्थागत खामियों का प्रतिफल हैं। पल्लवी मिश्रा इन कविताओं के माध्यम से समाज को जगाती हैं, झकझोरती हैं और संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं। इस संग्रह की कविताओं के केंद्र में समाज का वह वर्ग है जो आक्रोशित तो है, पर अपने आक्रोश को व्यक्त करने में अक्षम है। पल्लवी मिश्रा ने इन कविताओं में उसी मध्यम-वर्ग को अपनी आवाज़ दी है।

पल्लवी मिश्रा की कविताओं के पात्र पौराणिक और ऐतिहासिक काल को जीते हुए आधुनिक संदर्भ में प्रकट होते हैं। वस्तुतः, उनकी कविताएं पौराणिक, ऐतिहासिक और आधुनिक कालों को एक साथ जीती हुई चलती हैं। वे इन पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान के नए संदर्भों से जोड़ते हुए पाठकों के सामने नए दृश्य उत्पन्न करती हैं। उनकी कविताओं में काल-खंड अलग नहीं होते, बल्कि सभी काल-खंड एक अखंड और अनवरत चलने वाले काल में समाहित हो जाते हैं।

मैं नंदी
प्रतीक्षा का प्रतीक हूं
अनंत काल से ही,
भक्ति-प्रतीक्षा का आदर्श रूप जो है।
अंतहीन प्रतीक्षा ही तो है- यह जीवन।
जो होना है, उसके हो लेने में
समय है अभी जिसकी खातिर
जिए जा रहे हैं, बीते जा रहे हैं हम
बहे जा रहे हैं, समय के साथ
नदी की तरह।

(पृष्ठ- 18)

मैं राम हूं-
मेरे निर्वासन के
अनगिनत प्रयास पर
मुखरित अयोध्या
निर्वासित नहीं करती
मेरे हिस्से का प्रेम

(पृष्ठ- 76)

इस सदी का वियोग
राधा से कम कहां है, कृष्ण

(पृष्ठ- 81)

प्रेम किया था सुभद्रा ने शरण से
अपनी सफ़ेद साड़ी की सिलवटों
और धुले, उलझे बालों को
उंगलियों के पोरों से समझाते
कौंध जाया करता था प्रेम।

(पृष्ठ- 135)

तुम वेश्या हो, गोलपी
क्या सुनती हो, पोथियों में
पोथियों ने छल किया हमेशा ही
नगरवधुओं के साथ

(पृष्ठ- 139)

विवशता और विद्रोह की उत्कंठा- एक साथ- इन पंक्तियों में परिलक्षित होते हैं-

इस युग ने
मेरी भक्ति को खंडित कर देने को
खींच रखी हैं दीवारें
सामने मेरे
न धूप है, न दीप
न ही मेरे आराध्य का धाम

(पृष्ठ- 19)

गंगा, यमुना, हिमालय, देवदार, प्रकृति, मौसम, धरती, बरगद को संबोधित करते हुए वे प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन भी करती हैं, साथ ही, प्रकृति के क्षरण से क्षुब्ध भी होती हैं।

दरकते पहाड़
सिकुड़ते बुरांश
कि ऊंची हो चुकी हैं
हिमालय से अधिक
घाटियों की क्षुद्र महत्वाकांक्षाएं

(पृष्ठ- 29)

मौन
साधक-सा
अलख जगाए
जलता है
देवदार
अपनी समाधि में
धीमी धूनी-सा
न जाने कितनी सदियों के
अनिश्चित पहरों में
उठ-उठ कर जलेगी
जंगलों की आग

(पृष्ठ- 33)

पल्लवी मिश्रा की कविताएं कोमल हृदय की अभिव्यक्ति भी हैं। प्रेम उनकी कविताओं का प्रिय विषय है, पर वह प्रेम में महज समर्पण पर ही विश्वास नहीं करतीं, यहां भी कहीं विद्रोह उनके मन से स्वाभाविक प्रवृत्ति की तरह उभरकर सामने आता है। प्रेम के विविध रूप उनकी कविताओं में इस तरह से प्रकट होते हैं-

ज़्यादा करीब न आओ, रुपहले चांद
आसान नहीं
धरती-सा होना,
प्रेम में भी।
धरती का निर्विकार प्रेम-
धुन है
धुरी है
ध्यान है
जीवन का उन्माद है।

(पृष्ठ- 44)

और ये भी-

मंदिरों में बुझी प्रेम की लौ
मिटती नहीं
और
बनने लगती है द्वीप
जिस पर रहने लगते हैं
शोर मचाते तोते,
सफेद बगुले, कठफोड़वे और कबूतर
मिलने लगते हैं
सीपी में बंद मोती
मोती-
जो होते हैं
सीपी के प्रेम की लौ का जतन

(पृष्ठ- 106)

उनकी उपमाएं अनूठी हैं-

कापालिक-सा प्रेम
भैरवी-सा समर्पण
प्रेम से विलग होती सृष्टि के
दुर्भिक्षी का उद्घोष है।
प्रेम-
जो विडंबना-भरा प्रयास-भर है

(पृष्ठ- 129)

प्रेम की एक नई परिभाषा देखिए-

जीवन के बसंत पर
अर्थपूर्ण है- प्रेम का पलाश होना
सुर्ख़ और गंधहीन।
ठूंठ पर उगते पलाश का ऐश्वर्य
जीवन-समिधा के अग्निहोत्र की
संपूर्ण अभिव्यंजना है

(पृष्ठ- 131)

ये कविताएं पाठक को एक ऐसी दुनिया में लेकर जाती हैं जिससे वह परिचित तो है, पर उसने कभी भी इस दुनिया को उस दृष्टि से नहीं देखा जिस दृष्टि से कवयित्री ने देखा- जाना- समझा है। लोकतंत्र में ‘लोक’ को लोक के अधिकारों से परिचित कराने का प्रयास हैं पल्लवी मिश्रा की कविताएं।

पल्लवी मिश्रा की कविताओं में व्यंग्य बहुत तीखा है। जब वे समाज के खोखलेपन और तथाकथित ‘ऊंचे लोगों’ की प्रवृत्तियों को उजागर करती हैं तो वे मध्यम-वर्ग का प्रतिनिधित्व करती नज़र आती हैं। छद्म-बौद्धिकता से उन्हें सख़्त नफ़रत है। ‘पास कैसे गए मध्यवर्गीय’ इस संग्रह की बेहतरीन कविताओं में सेेे एक है, जिसमें व्यंग्यपूर्ण भाषा में वे कहती हैं-

वो ऊंचे लोग हैं, मध्यवर्गीय
होते हैं बड़े ही मसरूफ
नहीं होता है वक़्त
लिखना लड़ना है, मध्यवर्गीय
अपने से, समाज से
सबसे बड़ी जिम्मेदारी है
तुम क्या जानो, मध्यवर्गीय

(पृष्ठ- 67)

उनके परिचय के शब्दों में
वो होते हैं किसान, मजदूर
और गढ़ सकते हैं
असंख्य भविष्य
विद्वता तलवार की धार है, मध्यवर्गीय
मिटा भी सकती है
असंख्य भविष्य
औरों का भविष्य भी
वो ऊंचे लोग हैं, मध्यवर्गीय
जानते हैं महत्ता अपनी
पर्दों के पीछे के
निदेशक हैं वो

(पृष्ठ: 68-69)

पल्लवी मिश्रा की कविताओं के कई वाक्य मुहावरों की तरह प्रयोग किए जा सकते हैं।

ये शहर-
अमानुष हो चुके हैं।

(पृष्ठ- 163)

एक बेदिली
हर आने वाले कल को
आज ही जी लेना चाहती है

(पृष्ठ- 149)

प्रतिध्वनियों का मानवीकरण देखिए-

प्रतिध्वनियां
लौट आती हैं
जैसे लौटा दी गई हों
अनजान बस्तियों से
बैरंग

(पृष्ठ- 154)

कुछ कविताओं से गुज़रते हुए पाठक को यह महसूस हो सकता है कि वे अत्यधिक विस्तार लिए हुए हैं, परंतु, संभवतः, यह भावनाओं का उद्वेग है जो इन कविताओं को विस्तार देता है, क्योंकि इससे इन कविताओं का प्रभाव कम नहीं होता।

पल्लवी मिश्रा अंग्रेज़ी साहित्य की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं, इसलिए उनकी कविताएं पाश्चात्य साहित्य से भी प्रभावित हैं, जो कि बहुत स्वाभाविक है। दुनिया-भर के साहित्य के अध्ययन ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है। और अपने इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण उनकी कविताएं आधुनिक कविताओं की भीड़ में अलग खड़ी नज़र आती हैं।

इस संग्रह की कविताओं में हिंदी कविता के भविष्य की आहट स्पष्ट सुनी जा सकती है। ‘विलोल वीचि वल्लरी’ में संकलित कविताओं से गुज़रते हुए एक बात तो निश्चित रूप से कही जा सकती है कि पल्लवी मिश्रा की कविताएं आने वाले समय में हिंदी साहित्य-जगत को अवश्य समृद्ध करेंगी।

एक बेहद संभावनाशील कवयित्री का हिंदी साहित्य जगत में जोरदार स्वागत होना चाहिए।

  • डॉ. राकेश जोशी
    एसोसिएट प्रोफ़ेसर (अंग्रेज़ी साहित्य)
    राजकीय महाविद्यालय, मजरा महादेव
    पौड़ी (गढ़वाल)
    उत्तराखंड

संग्रह का नाम: विलोल वीचि वल्लरी
कवयित्री: पल्लवी मिश्रा
प्रकाशक: देवभूमि विचार मंच प्रकाशन, देहरादून (उत्तराखंड)
प्रथम संस्करण: 2021
आईएसबीएन: 978-81-952888-3-0
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