साहित्य

सहज मन की सहज अभिव्यक्ति है सौहार्दिका : डॉ.अनिल शर्मा अनिल

पुस्तक समीक्षा
समीक्षित कृति- सौहार्दिका
समीक्षक- डॉ अनिल शर्मा अनिल
(काव्य संकलन)
कवयित्री-आभा चौहान

दि ग्राम टुडे

सौहार्दिका काव्य संकलन में कवयित्री आभा चौहान का कथन,जब जब जैसे जैसे मन में विचार आते, मैनें उन्हें कागज पर उतार दिया।उनकी रचनाधर्मिता और रचना प्रक्रिया को अभिव्यक्त करता है।
कुल 72 रचनाओं वाले इस संकलन को कवयित्री ने अपनी सासू मां राधिका चौहान,सभी शुभचिंतकों और पति कमलेश चौहान को समर्पित किया है।


आभा चौहान की भावप्रधान तुकांत रचनाओं पर सुप्रसिद्ध गीतकार विष्णु सक्सेना, हाथरस लीला पेंढारकर,कर्नाटक की अनुशंसात्मक टिप्पणियां सौहार्दिका की रचनाओं और रचनाकार के प्रति सृजनात्मक लेखन की प्रशंसा कर रही है।
इन रचनाओं के शीर्षक पाठक को सहज ही आकर्षित करते हैं।शारदे वंदना,बचपन की यादें,दिल कहता है, मोबाइल,कागज,आंखें, युवा शक्ति,जो पिता न होता,वो एक औरत है, अन्नदाता को बचाना है,यादें, शब्द,मेरा गांव, मेरे भारत जैसा हो, फुटपाथ की जिंदगी,नींद उड़ जाती है,पतंग और डोर, पुस्तक की व्यथा, मनाऊं कैसे,स्वार्थ,तन्हाई, मंजिल, महाशिवरात्रि, भेदभाव,खामोश दीवारें, मंहगाई,कोहरा,सूखा हुआ गुलाब,खंडहर मकान,अग्नि परीक्षा,प्रतीत की रीत,प्रकृति का श्रृंगार,एक और दिन,आशियां, इंतजार,खता किसकी,हम सफर,श्याम तेरी बंसी,प्रेम रंग से होली खेलो,समय,कविता, परोपकार, बारिश,सरदर्द हवाएं,मकर संक्रांति,मेरी प्यारी हिन्दी, चिड़िया,आया बसंत है,नया सवेरा, प्रतीक्षा,पिया का घर,उठे जब भी कलम,नारी हूं मैं,तेरी तस्वीर, उसे जीने दो,देश के दुश्मन, पहाड़ों की गोद, गुरु का साथ,ये धुआं,बंधन प्यार का,शहीद की सुहागन, बारिश का इंतजार, शहीदों को याद रखो, गुरु बिन ज्ञान नहीं,आसानी से नहीं मिली है आज़ादी,तुम न मिलों, फ्रेंडशिप, सरकार हम आपके साथ है,महक,प्रीत, शहनाई,रस्मो रिवाज।
इन रचनाओं में है त्यौहारों की उमंग,प्रकृति के रंग,समाज का व्यवहार,मन के उद्गार, विविध विषयों पर सहज अभिव्यक्ति,अपने आसपास के ही व्यक्ति, पुरानी यादें, परिवार,वादें और सहज प्रस्तुति। रचनाकारों में है प्रवाह और गति।
भाषा आम बोलचाल की ही है।शब्दों की जबरन बनावट और बुनावट से परे बिना लाग लपेट के सीधे सीधे अपनी बात कह देना आभा चौहान को अलग पहचान देती है।
कुछ उदाहरण दृष्टव्य है-

न जाने कब बीत गए वो सुहाने दिन,
दोस्तों के बिना लगता नहीं था मन।
अब तो सिर्फ रह गई है यादें ही यादें,
कितनी सारी वो अनकही बातें।
अब तो सिर्फ यादें गले लगानी है,
मेरे यारो जरा सुन लो ये बचपन की कहानी है

दिल कहता है
दिल के अंदर अभी भी,
एक बच्चा रहता है।
जिंदगी जीने के लिए,
मुझे बार-बार कहता है।

मोबाइल
बिल भरना आसान हो गया, तुम्हें मिल गया है आराम,बाहर नहीं पड़ेगा जाना,इसी से होंगे बैंक के काम।

जो पिता न होता
हर बच्चा भूखे पेट होता,जो इस दुनिया में पिता न होता,सारे खिलौने पराए होते,गर पिता ने दिलाया न होता।

यादें
अपनी कुछ यादों को मैंने, पन्नों में रखा है सहेजकर,जीवन के कुछ सुनहरे पलों को, फोटो बनाकर रखा है भेज पर।

शब्द
हथियार उठा के युद्ध करो,अब दे दो इनको मात,निकालकर बाहर फेंक,बता दो इनको इनकी औकात।

पुस्तक की व्यथा
बदली समय की ऐसी धारा,घट गया पुस्तक का मोल,खुद को अकेले में कोस रही,जो थी कभी अनमोल।

अग्निपरीक्षा
कह दो इस बारे जमाने से,मत डरो आवाज उठाने से,तुम मत करना मेरी रक्षा,अब न दूंगी मैं अग्नि परीक्षा।

आया बसंत है
जी चाहता है तितली बनके मैं उड़ जाऊं,
बगिया के फूलों पर बैठकर इतराएं
आज मेरा घर मुझे लग रहा तंग है
देखो थी सखी देखो आया बसंत है

रस्मो रिवाज
कितनी सुन्दर है ये रस्में
दिल से इन्हें अपना लो
दूर मत भागो इनसे,गले से अपने लगा लो।

सौहार्दिका को पढ़ते हुए लगता है कि कवयित्री
ने अपने एहसासों को, भावनाओं को अभिव्यक्त करने में किसी भाषा विशेष,चौथ बंद विशेष की सीमाओं को नहीं माना।सहज मन की सहज अभिव्यक्ति के विविध रंगों से सजी सौहार्दिका के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
समीक्षक- डॉ अनिल शर्मा अनिल
समीक्षित कृति- सौहार्दिका (काव्य संकलन)
कवयित्री-आभा चौहान
प्रकाशक-समदर्शी प्रकाशन मेरठ,
पृष्ठ 98

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