कवितासाहित्य

सांसो में सांसे समाती ही रही

__राजेश राठौर झूमका

सांसो में सांसे समाती ही रही
हमें याद तेरी आती रही
कर वो ज़माना गुज़र जो गया
वो यादें हमें अब रुलाती रही!!

बड़े लाड़ से पाला था तुझको
इक इक दिन दुलारा था तुझको
देखें थे सपने जो मिट से गए
वो बाते हमें यूं तड़पाती रही!!

थक सा गया हूं न चलहूं मैं पाता
लड़खड़ाते कदम लकड़ी किनारा
सोचा था मुझको तू देगा सहारा
बूढ़ी आंखें ये आंसू बहाती रही!!

कैसे गुजारे वो,जो दिन थे मेरे
बचपन से लेकर जवानी के घेरे
यादों में तेरी जो सपने संजोए
बिखरते रहे वो रूलाती रही!!

उंगली पकड़ सिखाया था चलना
बिठाकर कांधे पर घुमाया था गांव अपना
बनेगा सहारा बुढ़ापे का मेरा
वही सोच दिन सोच सताती रही!!

दर-दर भट्टका टेका था माथा
हजारों दुआएं करता में जाता
बनकर मेरे नैन करेगा उजाला
दिन रात आंखें आंसू बहाती रही!!

राजेश राठौर झूमका

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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