साहित्य

सुंदरकांड का कर्म योग

आज हम योगेश्वर श्रीकृष्ण के योग उपदेश के मूर्त रूप श्री हनुमान जी के द्वारा संपन्न कियेगए निष्काम कर्म योग को समझने का प्रयास करते हैं

अरुण कुमार त्रिपाठी

गीता में बताया गया कर्म योग को पूरी तरह से रामचरितमानस सुंदरकांड मे समझाया गया ।चरितार्थ किया गया है रामचरितमानस में। हमने देखा है कि हनुमान जी ने विशाल सागर पार करने को भी अपना कार्य नहीं माना बल्कि उसे भी भगवान राम के द्वारा संपन्न होना माना हनुमान जी अपनी सारी उपलब्धियों को कैसे भगवान को अर्पित करते हैं हनुमान जी का कर्म योग कर्म करने का उमंग और उत्साह हनुमान जी में कूट-कूट कर भरा है कोई संशय अथवा कर्म से पलायन नहीं हो रहा है। वे तो हर्षित अवस्था में ही अपने सब काम कर रहे हैं
चलेउ हरषि हिय धरि रघुनाथा

हनुमान जी कदम कदम पर समझते हैं और हमें समझाते हैं कि जो भी हो रहा है राम का काज हो रहा है मेरे द्वारा जो हो रहा है वह भी राम का काज है राम ने मुझे निमित्त बना करके अपना काम किया है इसलिए हनुमान जी को रास्ते में जो बाधाएं भी मिलती हैं वह भी आशीर्वाद देतीहैं
राम काज सब करिहहु
तुम बल बुद्धि निधान आशीष देइ गई सो
हरषि चलेउ हनुमान
और आशीष मिलते ही
वारिधिपार गयऊ मतिधीरा ।
हनुमान जी लंका जा रहे हैं दो काम करने के लिए पहले काम है सीता की खोज करना दूसरा काम है राम काज करना ऐसा ही हनुमान जी ने परीक्षा लेने को आई सुरसा को बताया था और कहा था
1——-राम काज करि फिर मैंआवौं
और
2—–सीता कैसुधि प्रभुहि सुनावौं

      हम आगे भी देखते हैं कि हनुमान जी के लिए दो काम है ऐसा हनुमान जी ने भी स्वयं रावण को बताया था लंका पहुंचकर विभीषण से मिलने के बाद हनुमान जी ने सीता माता के दर्शन कर लिए हैं सीता की सुध तो मिल चुकी है। अर्थात पहला कार्य , सीता की खोज तो पूरा हो चुका है ।लेकिन फिर भी हनुमान जी रावण से कहते हैं  काम बाकी है
।जिन्ह मोहि मारा तेमैं मारा 
तेही पर बांधेउतनय तुम्हारा 

हनुमान जी आगे कहते हैं लेकिन फिर भी मुझे कोई शिकायत नहीं है। क्योंकि मुझे तो प्रभु का काम करना है ।
मोहि न कछु बांधे कइ लाजा
कीन्ह चहउं निज प्रभ करकाजा
यह बात हनुमान जी ने रावण को सीता माता के दर्शन के बाद कही है जिसका तात्पर्य है कि सीता की खोज करना ही एकमात्र राम काज नहीं था रामराज के संबंध में स्वयं श्री राम ने हनुमान जी से रिपोर्ट मांगी ।जब हनुमान जी लंका में अपना काम करने के बाद श्री राम के पास पहुंचते हैं तो श्री राम ने भी उनसे दो कार्य के बारे में हीपूछा है।राम ने पहले पूछा है ।

1—-कहहु तात केहि भांति जानकी ।

इसका यथोचित उत्तर मिलने के बाद श्री राम ने हनुमान जी से पूछा
2—— कहु कपि रावन पालित लंका
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका
इसकी भी रिपोर्ट मिलने के बाद रामजी ने समझ लिया कि हनुमान जी ने राम काज करके बहुत बड़ा काम किया है। इसलिए वे हनुमान जी से कहते हैं हनुमान जी बताइए आपने इतने बड़े-बड़े कार्य अकेले कैसे कर लिए हनुमान जी इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं और कहते हैं प्रभु मैंने कौन सा कार्य किया है प्रभु आप मुझे लज्जित क्यों कर रहे हैं। फिर भी श्री राम कहते हैं हनुमान तुमने बहुत बड़ा कार्य किया है । सुरक्षित लंका में प्रवेश कर गए लंका में आग लगा दिया राज कुमार को तथा राक्षसों को मारा। श्री राम जी संकेत देते हैं कि हनुमान जी आपने बहुत बड़ा काम किया है ,रावण की लंका में प्रवेश कर पाए और लंका में आग लगा पाए वास्तव में यह बहुत बड़ा कार्य है। उसके बाद भी हनुमान जी विनम्रता का परिचय देते हुए कहते हैं कि मैंने कोई कार्य नहीं किया दोनों अपनी-अपनी श्रेष्ठता के हमें दर्शन करा रहे है राम की पूरी कोशिश है कि हनुमान जी में कर्तापन का गुमान आ जाए। लेकिन हनुमान जी भी इससे बचने की पूरी कोशिश करते हैं वह प्रभु के चरणों में गिर जाते हैं ,उठ नहीं रहे हैं। प्रभु बार-बार उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन हनुमान तो प्रेम में मगन उठने की इच्छा ही नहीं करते। प्रभु को हनुमान को उठाने की कोशिश करनी पड़ी ।प्रभु ने हनुमान को उठाया और अपने हृदय से लगा लिया। फिर अपने अत्यंत समीप बैठाया और पूछा बताओ हनुमान बताओ तुमने रावण जैसे पराक्रमी दुर्दांत राक्षस द्वारा पालित, सुरक्षित लंका को उसके बांके किले को कैसे ध्वस्त कर जला दिया। यहां श्री रामजी संकेत दे रहे हैं कि हनुमान तुमने बहुत बड़ा काम किया है। रावणजैसे वैज्ञानिक और बलशाली राक्षस की लंका को जलाया यही महान कार्य है लंका को नहीं उसकी बांके किले को भी जलाया यह महानतर कार्य है। लंका को उलट पलट कर जलाया उसके गोनीय परमाणु संयंत्रों को जलाया, यह महानतम कार्य है। इतना बड़ा बड़प्पन और सम्मान राम से मिलने के बाद भी हनुमान सावधान सतर्क और सरल बने हुए है। यही हनुमान का कर्म योग है। ऐसी स्थिति में सामान्य ब्यक्ति कहता है कि हां भगवान यह सब आपकी कृपा से हो गया और यह तो कुछ भी नहीं है मैं तो औरबड़े काम कर सकता हूं। लेकिन ऐसा कहने का तात्पर्य होता कि मैंने कुछ किया कर्तापन का अभिमान आ जाता । ऐसी स्थिति में वही गति होती जो नारद जी की या पक्षीराज गरुड़ की हुई थी ।लेकिन हनुमान जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा और वे परीक्षा में हां हां परीक्षा में शत प्रतिशत सफल हुए। राम ने उन्हें डिगाने की बहुत कोशिश की ।लेकिन राम सफलनहीं हुए।यही तो रामत्व है भगवान जो भक्त से हारे।राम केबार-बार कहने के बावजूद हनुमान जी यही कहते रहे कि मैंने कुछ नहीं किया सब आपने किया है ।अब राम जी कहते हैं ,मैंने कैसे किया मैं तो यहां बैठा हूं। नहीं भगवान आप ने ही किया है मैं तो करने की सोच भी नहीं सकता था मैं यह मानता हूं जो आपने काम बताए हैं वह सब काम हुए तो हैं।
1–सिंधु को पार किया गया है ।
2–हाटक और पुर ,नगर और किला जले तो है और
3—अशोक वन उजड़ा भी है राक्षसों को मारा भी गया है ।
यह सब काम तो हुए हैं ।लेकिन मैंने नहीं किया ।अब आप नहीं मानते तो मैं बताता हूं सिंधुपार आपने कराया ।मैं तो पार जाने की हिम्मत हीनहीं कर पा रहा था ।तब मैंने रघुनाथ को याद किया एक बार नहीं बार-बार ।
बार बार रघुवीर संभारी ,
फिर क्या हुआ आपको मालूम है, फिर हुआ यह कि
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना
एही भांति चलेउ हनुमाना
हनुमान ने कुछ नहीं किया हनुमान तो रघुनाथ के बाण की तरह चले जा रहे हैं एही भांति चलेउ हनुमाना
आप ही बताइए भगवान क्या बाण अपने आप आगे पीछे कहीं जाता है वह तो चलाने वाले की क्षमता और दिशा के अनुसार ही आगे बढ़ता हैजब बाण स्वत: गति मान नही हो सकता तो हनुमान सागर कैसे लांघ सकताहै।मैंने सागर पार कैसे किया ।मैने तो बस
बार-बार रघुवीर संभारी
तरकेउ पवन तनय बल भारी

जिसका ही नतीजा था
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना
एही भाति चलेउ हनुमाना

रघुनाथ के प्रभाव से बारिधि पार गयो मतिधीरा
सागर पार करने के बाद हाटकपुर नगर और किला भी आपने आपने ही गिराया और जलाया ।आपने मेरा नाम जरूर लगा दिया और मैंने सेवक धर्म निभाते हुए इसे स्वीकार कर लिया जबकि हकीकत यह है कि आपने माता सीता को पावक में निवास कराया था माता के मुझे दर्शन हो जाएं इसीलिए आपने मेरी समझ में रावण से आग लगवाई थी । पावक मे माता के दर्शन होने के कारण ही मै छोटे से रूप में आकर बंधन से मुक्त हो गया था । क्योंकि माता पिता की नजरों में पुत्र कभी बड़ा नहीं हो सकता।

पावक जरत देखि हनुमंता
भयउ परम लघु रूप तुरंति
अब आप ही बताइए अगर पावक में मुझे माता सीता के दर्शन न हुए होते तो मैं छोटा क्यों होता, बड़ा विशाल रूप बनाकर के बंधन को तोड़ कर मुक्त हो सकता था।माता के आशीर्वाद से और आपके चरणों के प्रताप से आगे की घटनाएं घटती चली गई ।भगवान आपतो जानते हैं लंका में आग कब लगी
जब
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास अब तो सिद्ध हो गया कि हरिकी प्रेरणा से चले 49 ओ पवन ने लंका में आग लगाई है मैंने नहीं । हां अशोक वन कोउजाड़ना आप जरूर मेरे काम में डाल सकते हैं, जबकि वह भी मैंने माता सीता के आशीष बच्चों को पालन करते हुए ही किया है आपको तो मालूम ही है माता का आदेश था ,
रघुपति चरन ह्रदय धरि तात मधुर फल खाहु। अब तो स्पष्ट हो गया माता का आदेश और रघुपति चरणों का प्रभाव कि
नाथ एक आवा कपि भारी
जेहि अशोक वाटिका उजारी
अब आप ही बताइए भगवान माता के आदेश नेअशोक बन उजाड़ा ,या मेरे जैसे तुच्छ वानर ने ,याकि रघुवीर के चरणों के प्रताप ने ।भगवन् मान भी जाइए मैंने कोई कार्य नहीं किया ।केवल वानर सुलभ उछल कूद ही किया है जैसे
साखामृग कै बड़ मनुसाई
शाखा तै शाखा पर जाई
इसीबानरी उछल कूद में अगर सिंधु का लंघन हो गया तो मेरा क्या दोष ,इसी उछल कूद में हाटक ,पुर जल गए तो मेरा क्या दोष निशाचर मर गए तो मेरा क्या दोष। देखिए एक कपि का काम
शाखा ते शाखा पर जाई
और हनुमान का काम
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई
इसी कारण
जरइ नगर भे लोग बिहाला ।नगर जल रहा था ,जलाया नहीं था जल रहा था स्वत: नगर को जलाने का कार्य तो उनके राक्षसो ने ही किया था
नगर फेरि पुनि पूंछ प्रजारी ।नगर मे घुमाकर फिर पूंछ मे आग लगा दी।मैने कहीं आग नही लगाई। ।हे भगवान मेरे द्वारा नहीं किए गए कार्य के लिए मुझे दोष ना दें ,क्योंकि
नाघि सिंधु हाटक पुर जारा
निसिचर गन बधि विपिन उजारा
वाली जो बात है
इसके लिए मैं नहीं आप जिम्मेदार हैं
सो सब तव प्रताप रघुराई
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई
भगवान भी हनुमान के तर्कों के प्रभावित हो गए और स्वीकार किया कि सुनिप्रभु परम सरल कपि बानी
एवमस्तु तब कहेउ भवानी
यही तो है गीता का असली तात्विक निष्काम कर्म योग हम कुछ नहीं करते हम कुछ कर भी नहीं सकते इसीलिए जो भी हो रहा है मान लो उसके द्वारा हो रहा है हम केवल निमित्त मात्र हैं इसलिए जो भी करो भगवान का समझ कर करो भगवान के लिए करो भगवान की मानकर करो तो कर्म बंधन से बचे रहोगे।
गीता अध्याय 3 श्लोक 31
येमे मतमिदम् नित्यमनुतिष्ठंति मानवा:
श्रद्धावान ऊत्तम मुच्यन्ते तेपि कर्मभि:

ओम जय श्री सीताराम

योगेश्वर श्रीकृष्ण की जय

25/11/2021

अरुण कुमार त्रिपाठी
गोमती नगर _ लखनऊ

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!