साहित्य

सुनो बाबू

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”

सुनो बाबू,🌹
लगानी है मुझे भी
तुम्हारे प्रेम की मेंहदीं।
जिसका रंग चढ़ता ही जाये ,

ताउम्र,
गहरा,गहरा,और गहरा
क्यूँकि कहते हैं
रंग हिना का
जितना गहरा चढ़ेगा
साजन का प्यार
उतना ही बढ़ेगा।

इसीलिये ही तो डरती हूँ,
तुम्हारे नाम की
मेंहदी लगाने से पहले,
कहीं रंग गहरा ना चढ़ा तो,
आस और विश्वास की डोर
कमजोर निकली तो,

और मेंहदी का रंग,
उतरना भी तो है,
तो क्या उसके साथ
तुम्हारे प्रेम का रंग भी
उतरने लगेगा,
मुझे उतरता,चितकबरा
मेंहदी वाला हाथ बिलकुल नहीं पसन्द,
कहीं उतरती मेंहदी
वाले हाथ की तरह ,
तुम्हारे प्रेम का रंग भी तो नहीं… ???

अगर हाँ तो,
नहीं लगानी मुझे
कभी मेंहदी अपने हाथ पर,
अविश्वास से भरी,
क्योंकि तुम्हारे प्रेम पर
अटल विश्वास
मैं आँख बन्द करके
करना चाहती हूँ ।

और चाहती हूँ रचाना
अपनी रूह पर
तुम्हारे प्रेम की,विश्वास की,
कभी ना उतरने वाली
सुर्ख हिना,
जिसकी लाली में रंगे मेरा
हर अंग, हर सुबह,
हर शाम,हर रात
मैं तुम्हारी “अमर प्रीति” से रच
सात जन्मों तक इतराऊँ,इठलाऊँ,
“अखण्ड-सौभाग्यवती” बन….!!”

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोएडा

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