कवितासाहित्य

सुन ले मां की पुकार

__डॉ पंकजवासिनी

अपने अंधे स्वार्थ की धुन में
बढ़ता मनुष्य …
खोता जा रहा है नित
निज रूप मानव !

नहीं रहा वह
दया करुणा का स्वामी !
प्रकृति का पोषक !!
धरा का सुहृद हितैषी !!!

उसे तो बस
अपनी प्रगति की ही कामना !
अपने विकास की ही इच्छा !!
अपनी महत्वाकांक्षा की ही चाह !!!

प्रगति के सोपानों को
नित गढ़ता …
वह चला जा रहा है
मानवता से दूर !

पीड़ा से कराहती …
नित जर्जर होती …
काया से होती क्षीण …
अपनी ही धरती माता की पुकार !
कर रहा वह नित अनसुनी !!

कलयुगी पूतों की भांति
अपनी ही जीवनदायिनी धरती मां
पर किए जा रहा है अत्याचार !
नित करता उसका दोहन …!!
नित करता उसका शोषण …!!!

नहीं सुनता विवश मां की पुकार !
नहीं करता क्षत-विक्षत मां की देखभाल !!
मार रहा निज पांव पर कुल्हाड़ी !!!

जाने कब समझेगा :
है माता पृथ्वी तो हैं हम मानव !
हैं धरा के जीव जगत !!
है पृथ्वी माता का जीवन
तो है हमारा अस्तित्व !!!

आओ : पृथ्वी दिवस पर
हों हम संकल्पित !
एक दिन नहीं ,
नित करेंगे हम :
पृथ्वी का पोषण !

नहीं तो ,
जिस दिन धरा का धैर्य चुक जाएगा …
कुपित धरा का कोप बरसेगा …
प्राकृतिक आपदाओं के मिस !
और फिर
हमारा अस्तित्व मिट जाएगा!!

डॉ पंकजवासिनी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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