कवितासाहित्य

हमनें रात को ढलते देखा

हमनें रात को ढलते देखा,
हर अपनों को बदलते देखा,
कलियों को फोल और फूलों..
को मुरझा कर बिखरते देखा..
हमनें रात को ढलते देखा..

उगते सूरज को नमन करते देखा,
डूबते को नजर उठा कर भी देखते ना देखा,दुनिया सलाम करती है पद,प्रतिष्ठा,और माया को, हमनें रोते बिलखते बच्चें को
देखा,हमनें रात को ढलते देखा…

बिन रोए मां भी बच्चें को दूध पिलाती नहीं,स्वार्थ के सब रिश्ते नाते माया पर सब आके जाते,संतानों में भेद कर जाते जो
मोटी गड्डी दे जाते, दुनियां के हर रंग को देखा,अपनों को गैरों को देखा,हमनें रात को ढलते देखा…

कहते हैं भेख से भीख मिलते हैं,
खाली जेब लेके निकलो,कुर्सी तो दूर,लोग नजरें चुरा के निकाल जायेंगे, दो रुपए उधार मांग ना बैठे लोग कतरा कर निकल जाएंगे, हमनें रात को ढलते देखा…..

कविता लेखिका मनीषा झा
जिला – सिद्धार्थनगर
यूपी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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