साहित्य

हम तो परिंदे हैं

लक्ष्मी कल्याण डमाना

हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं।

हम बैठते हैं मंदिर की बुरजियों पर,
मस्जिदों के गुंबद पर,
गिरजाघर की छत पर,
गुरुद्वारे की बुरजियों पर,
हमारे लिए मजहब की दीवार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं।

हम रहते हैं पेड़ों पर,
फुदकतें हैं जमीन पर,
तैरते हैं सागर में,
उड़ते हैं खुले आसमान पर,
हमें किसी सीमा की,
पहचान नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं।

हम बैठते हैं हिंदू के छज्जे पर,
मुसलमान की मुंडेर पर,
ईसाई के घर के जंगले पर,
सिख के चौबारे पर,
हमें किसी जाति या धर्म की,
पहचान नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं।

हमें अच्छी लगती है,
मंदिर में बजती हुई घंटियां,
मस्जिद की आवाज भी,
गिरजाघर की प्रार्थना भी,
गुरुद्वारे की गुरबाणी भी,
हमें इसके भेद की,
पहचान नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं।

हम उड़ते हैं उत्तर से दक्षिण तक,
पूरब से पश्चिम तक,
देश और विदेशों में,
हमें किसी वीज़ा की दरकार नहीं होती,
हम तो परिंदे हैं,
हम परिंदों को किसी,
पहचान की दरकार नहीं होती,
क्योंकि हम तो परिंदे हैं।

लक्ष्मी कल्याण डमाना
राजपुर एक्सटेंशन,
छतरपुर, नई दिल्ली।

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