कवितासाहित्य

हवा में लटका आदमी: हवा में लटक जाता है आदमी

  • __अमिताभ शुक्ल

जब उसका घर नहीं होता ।

कोई साहिल नहीं होता ,

और कोई सैयाम नहीं होता.

नहीं होता उसका कोई अपना,

कोई सपना और भटकता है,
यायावर की तरह,
तलाश में किसी अपने की।

ऐसी जगह जहां वो ठोर बना लेl

इंसान घर बनाता है,और रिश्ते भी ,

इच्छाएं और वासनाएं

होती हैं संतुष्ट ,

घर बना लेने के बादl

लेकिन इच्छा विहीन आदमी ,

नहीं बनाता घर ,

क्योंकि उसे कोई अपना नहीं मिलता ।

घर बना लेने से इज्जत होती है,

शोहरत और संतुष्टि का प्रबंध , वासनाओं की संतुष्टि का ,

समाज में नाम और सम्मान का .

इस तरह ,मोहल्ले और शहर
में ,
इज्जत कमाता है आदमी।

जबकि,बिना घर का आदमी,

हवा में लटका होता है ।

क्योंकि न उसका पता होता है ,

न सपने, न इच्छाएं l

मर जाएगा लावारिश,

दूर रहो उससे,

समझाते हैं सबको ,

संभ्रांत नागरिक ।।

अमिताभ शुक्ल

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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