साहित्य

हाँ दिलों में प्यार का प्रकाश हो

रामकुमार शर्मा रागी

आस हो , विस्वास हो , उल्लास हो
जो हुआ अब तक नही, प्रयास हो
मैं तुम्हें कहता नही दीपक जलाओ
हाँ दिलों में प्यार का प्रकाश हो

गर दीयों में नफ़रतों का तेल है
फिर तो समझो ये सियासी खेल है
आंधियों को भी सहारा मिल रहा
इन अंधेरों से किसी का मेल है

इन चरागों का बहाना छोड़िए
जोड़ना है तो दिलों को जोड़िए
खुद ब ख़ुद ही रोशनी हो जाएगी
इस तरह से रुख हवा का मोड़िये

जल रहे हैं दिल दीयों के नाम पर
हम बहकते दोष लगता जाम पर
इन दीयों से किस तरह खुशियां मिले
जब भरोसा तक नही हैं राम पर

है सुरक्षित देश तो समझो दीवाली है
है सनातन वेश तो समझो दीवाली है
एकता का ही दीया बस करेगा रोशनी
अस्मिता है शेष तो समझो दीवाली है

घोषणा —
रचना स्व रचित ,मौलिक व अप्रकाशित है

रामकुमार शर्मा रागी
कस्बा भोकरहेड़ी
जनपद मुज़फ्फरनगर उ प्र

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