साहित्य

हां मैं मज़दूर हूं

प्रेम बजाज

हां मैं एक मज़दूर हूं , खुला आकाश मेरी छत है , तपती धरती मेरा बिछौना है ।
टूटी-फूटी अपनी झोंपड़ी में मुझे हंसना और रोना है ।
नहीं चाह मुझे महल – माड़ियों की , घास – फूस की कच्ची मिट्टी की झोंपड़ी में
ही खुश हूं मैं , क्योंकि मैं मज़दूर हूं ।
सूट – बूट तो बड़े लोगों के शौंक हैं , चीथड़े मेरा लिबास हैं ।
पूनम की चांदनी में पढ़ते बच्चे मेरे , मेरा गौरव , मेरा विश्वास हैं ।
जब हो जाते अच्छे नंबरों से पास तो खुशी बहुत मनाता हूं ,
ना पढ़ने को , रहने – खाने को सुख – सुविधाएं उन्हें , इसलिए मैरिट की
ना चाहना रखता हूं , हां मैं एक मज़दूर हूं ।
चीर के पर्वत का सीना झरना मैं बहा दूं , धरती की गोद से दरिया मैं निकाल दूं ।
नहीं कर सकता मैं किसी चैक पर हस्ताक्षर, दिलों पर जो मिटे ना कभी नाम
ऐसा लिख जाता हूं । नहीं देखता अपने हाथों के छालों को , महल , गाड़ियां तुम्हारी
चमकाता हूं , हां मैं एक मज़दूर हूं ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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