साहित्य

हे ईश्वर !यह कैसा खेला”


मैं दुःख समझ गयी बालकपन में ही
बालकाल उलझन मन‌ दे दी
हे भाग्य !विधाता ईश्वर तूने
दुनिया क्यों सूनी कर दी,

समझ सकी ना प्यार का बंधन
हंसना खिलना देखा नहीं
बालपन मां खोयी मैंने
लूथ छुटा ब्याह जल्दी की,

डर लगता मनहूस सायें से
ऊंच-नीच ना हो जाये
पिता का साया पहले छूटा
पति आज स्वर्ग सिधार गये,

हँसना खिलना कब क्या देखा
बेटी गोद खेल रहीं
तीन बेटियां गोद मेरी में
जीवन दुनिया क्या जीने देगी,

भाग्य बिगाड़ा तूने ईश्वर
इतनी दुनिया दुःख की दे दी
सुहाग खिला क्या समझ नहीं पायी
सुहाग की नगरी लूट लयी,

क्या होगा क्या नहीं पता अब
रोजी रोटी कहां मिले
बारी उम्र का दर्द मिला है
दुखियारी दुख की कर दी।।

विमल सागर
उत्तर प्रदेश

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!