साहित्य

ज़ेरॉक्स को ओरिजनल कॉपी समझकर जी गए हम…

डॉ रमाकांत क्षितिज

इस तरह आज
52 बरस के
ज़ेरॉक्स कॉपी हो गए हम
यह काया तो ज़ेरॉक्स कॉपी
इसे से लिपटे रहे हैं हम
इसकी सफलता
काली स्याही सम
कभी फीकी
कभी गहरी
कभी तो बिन प्रिंट हुवे ही
निकले हैं हम
कभी कभी तो
उसी में फंस गए हम
कभी कभी
परिस्थिति रूपी मशीन में
उलझकर फट ही गए हम
भौतिक सफलता की कई कॉपी
प्रिंट कर गए हम
प्रारब्ध की स्याही से
रंग उठे हैं हम
जैसी जिसकी प्रारब्ध की स्याही
उस रंग में रंग गए हम
प्रारब्ध की स्याही
कर्म का कागज़
उसकी कृपा से
कोई ब्लेक एन्ड व्हाइट
कोई रंगीन रंग गए हम
ज़ेरॉक्स को ओरिजनल कॉपी
समझकर जी गए हम
ज़ेरॉक्स के चक्कर में
ओरिजनल को ही भूल गए हम
सब उसी की तो कॉपी हैं
नदियां झरने पर्वत
धरती और समंदर
लख चौरासी
बयालीस लाख धरती के ऊपर
बयालीस लाख समंदर के अंदर
अनगिनत ब्रह्याण्ड
उस ओरिजनल के ज़ेरॉक्स
ज़ेरॉक्स को ओरिजनल कॉपी
समझकर जी गए हम
जब होश आया
तब तक बदरंग हो गए हम
अब न सादे रहे हम
अब तो ओरिजनल की ही मर्जी
जैसा चाहे रंग दे
उसी के रंग में
रंग जाएंगे हम
ज़ेरॉक्स को ओरिजनल कॉपी
समझकर जी गए हम….

संकलन

विनोद कुमार सीताराम दुबे

संस्थापक सीताराम ग्रामीण साहित्य परिषद

एवं इंद्रजीत पुस्तकालय जुडपुर रामनगर

विधमौवा मड़ियाहूं जौनपुर

उत्तर प्रदेश

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