साहित्य

मानवता

-डॉ.संध्या श्रीवास्तव

मानवता में भाव समाहित,कर्मों का सम्मान है।
मानवता जीवन की शोभा,होता नित यशगान है।।

दीन-दुखी के अश्रु पौंछकर,
जो देता है सम्बल
पेट है भूखा,तो दे रोटी,
दे सर्दी में कम्बल
अंतर्मन में है करुणा तो,मानव गुण की खान है।
मानवता जीवन की शोभा,होता नित यशगान है।।

करो नहीं तुम अर्थ इकट्ठा,
तुम कुछ भी नहिं पाओगे
जब आएगा तुम्हें बुलावा,
तुम केवल पछताओगे
हमको निज कर्त्तव्य निभाकर,पा लेनी पहचान है।
मानवता जीवन की शोभा,होता नित यशगान है।।

शानोशौकत नहीं काम की,
चमक-दमक में क्या रक्खा
वहीं जानता सेवा का फल,
जिसने है इसको चक्खा
देव नहीं,मानव कहलाऊँ,यही आज अरमान है।
मानवता जीवन की शोभा,होता नित यशगान है।।
-डॉ.संध्या श्रीवास्तव
दतिया,मप्र

==प्रमाणित करती हूँ कि प्रस्तुत रचना मौलिक व अप्रकाशित है।

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