साहित्य

आराधना प्रियदर्शनी की कलम से

व्यक्तित्व निर्माण ही सृष्टि निर्माण

विचारों की सकारात्मकता,
वातावरण तक पहुंचती है।
पवित्र सोच की सुंदरता,
एक मन से दूजे मन तक पहुंचती है।।

एक कहावत ऐसी भी है कि,
अकेला चना भाड़ क्या फोड़ेगा।
पर यदि एक मनुष्य बस चाह ले तो वह,
हर बाधा, हर बंधन को तोड़ेगा।।

सोचा जाए तो विपदा बहुत बड़ी है पर,
कोशिश में उसका हल है।
हर आपदा बिखर कर ढेर हो जाए,
जो तू अडिग व अचल है।।

एक व्यक्ति ही विवेकानंद,
एक व्यक्ति की सोच से ही संसार शुद्ध हुआ।
एक व्यक्ति ही चंद्रशेखर आजाद,
एक व्यक्ति ही गौतम बुद्ध हुआ।।

क्या-क्या ना संभव हो पाया,
मानव के प्रयास और खोज से।
समस्त ब्रह्मांड बदल सकता है,
बस एक इंसान के सोच से।।

विचारों पर आधारित हमारी भावना,
भावना व वाचन से हमारी पहचान है।
हर व्यक्ति में क्षमता है परिवर्तन लाने की,
व्यक्तिव निर्माण ही सृष्टि निर्माण है।।

 
जो परिवर्तित कर देती तिमिर को प्रकाश में,
वह मानव और मानवता का ज्ञान है।
हर व्यक्ति में क्षमता है परिवर्तन लाने की,
व्यक्ति निर्माण से ही सृष्टि निर्माण है।।

परी

उसकी काया संगमरमर सी,
जुल्फ़ घने हैं बादल से,
वह मदमस्त बनाती है सबको,
रंग-बिरंगे आँचल से।

उसकी ऑंखें है हिरनी सी,
कोयल जैसी उसकी वाणी,
उसकी हर प्रतिक्रिया मनोरम,
अपनी वह जानी पहचानी।

सोती कमलों की पंखुड़ियों में,
उठती है रमणीय गुलाब में,
मिलन तो ऐसे मुमकिन नहीं पर,
मिलती है नित ख्वाब में।

उसकी हंसी है बिजली सी,
अलग उसकी है जादूगरी,
फूल कहूं, बहार कहूं, 
अप्सरा कहूं या कहूं परी।

उसका अपूर्व सौंदर्य है,
नहीं है वह ईश्वर से दूर,
परी ही कहते होंगे उसको,
या शायद जन्नत की हूर।

आराधना प्रियदर्शनी
स्वरचित एवं मौलिक 
हजारीबाग
झारखंड

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