साहित्य

अरे ये क्या !

अभिषेक

अरे ये क्या !
वो जीत कर भी हार गए ।
और हम,
हार कर भी जीत गए ।।
परन्तु आज,
प्यार करने वाले हार गए ।
और,
जात पात वाले जीत गए ।।

लो फिर अलग हो गए,
दो दिल ।
इस दुनिया की,
झूठी रिवाज़ो के कारण ।
खुदा भी रोया आज,
उनकी जुदाई पर ।
और झूठे लोग जश्न मना रहे हैं,
उन्हें बर्बाद होता देख ।
अरे ये क्या !
वो जीत कर भी हार गए ।
और हम,
हार कर भी जीत गए ।।
परन्तु आज,
प्यार करने वाले हार गए ।
और,
जात पात वाले जीत गए ।।

वो मजबूर थे,
दुनिया की बंदिशों के आगे ।
और वो बंदिशे थी,
समाज, धर्म और जाति की ।।
तोड़ना तो चाहा दोनों ने,
पर तोड़ नहीं पाए ।
अलग हुए एक दूजे से,
पर दिल एक दूजे को दे आए ।
अरे ये क्या !
वो जीत कर भी हार गए ।
और हम,
हार कर भी जीत गए ।।
परन्तु आज,
प्यार करने वाले हार गए ।
और,
जात पात वाले जीत गए ।।

अब किसी और के,
हो रहें हैं वो दोनों ।
जिन्होंने साथ चलने की,
कसमें खाई थी ।।
लो रुसवा हो गई,
फिर मोहब्बत दुनिया के आगे ।
और अधूरी रह गई,
फिर दो दिलों की दास्तां ।।
अरे ये क्या !
वो जीत कर भी हार गए ।
और हम,
हार कर भी जीत गए ।।
परन्तु आज,
प्यार करने वाले हार गए ।
और,
जात पात वाले जीत गए ।।

(अभिषेक सिंह पर्चा )

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