साहित्य

बदलो तो कुछ सोचकर बदलो

श्रीकांत यादव

भाषा बदली पहनावे बदले हैं,
बदले हिंदी के अंग्रेजियत आई।
भाई भाई का संबंध बदलकर,
बदली प्रवृत्ति और क्रूरता छाई।।

खान पान स्वभाव भी बदला,
चाल ढाल व्यवहार भी बदला ।
प्रीति रीति राजनीति भी बदली,
नहीं बदला ईमान जो गंदला।।

रंग बिरंगी दुनियां के बदले हैं ढंग,
दीप बदले दीवाली के होली के रंग।
स्वभाव इंसान का ऐसा बदला,
अब त्यौहार मनाए किसके संग।।

क्रीम लगा चेहरे की रंगत बदली,
रंग सुर्ख गुलाबी गालों ने ले ली है।
जब तब होंठों से गाली ना निकले,
मानो उसकी शिक्षा नकली है।।

संत समाज खूब उन्नति कर ली,
अपनी वस्त्र परिपाटी नहीं बदली है।
तेवर जेवर आभामंंडल सजाकर,
महिलाओं में अभिरुचि ले ली है।।

अतिथिदेव की मिथक भी बदली,
स्वभाव समझ लो जैसे मछली है।
रस रंग गंध पराग तलाशते,
उपवन में नयी आयी तितली है।।

उच्च संस्कारों की दिशा बदली है,
खुले केंद्र एक से एक नकली हैं।
अपने बच्चों को सुधार न सके जो,
सुधारवाद की उनकी आंधी चली है।।

स्वभाव संस्कार ऐसे चले हैं,
जिसके आगे तकनीकी चली हैं।
टीवी सिनेमा के चरित्र की महिमा,
दुनिया में जैसे ये महाबली हैं।।

परिवर्तन बिना बादल बदली है,
ऐसे ना बदलो जैसे ऋतु बदली है।
बदलो तो सोचकर ऐसा बदलो,
जीवन के संग दुनिया असली है।।

आस पड़ोस की फिजा भी बदली,
जैसे संबंध हो गया फसली है।
यदुवंशी संबंधों का क्या कहिए,
जैसे ढोल मंजीरा या दफली है।।

हुआ समाज का भाईचारा ढ़ीला है,
लेकिन रक्त संबंध तो असली हैं।
हां रिश्तों में वह गर्माहट कहां,
नजरें बस फिसली फिसली हैं।।

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326 ,दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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