साहित्य

बस यही चाह है मेरी

बलवान सिंह कुंडू ‘ सावी ‘

बड़े वृक्ष से टूटकर
कंपकपाता
तैरता हल्की हवा में
एक बीज था उधेड़बुन में
कहां पटकेगी उसे वात
ये सब किस्मत की बात
गिराएगी किसी उर्वर खेत में
या समुद्री शांत शीत रेत में
ताउम्र सहूंगा तपती लू
या सुनूंगा नफ्सनियत गुफ्तगू
अटकूंगा जमुना तट पर
कान्हा, चढ़ ऊंची डाल मेरी
मुरली की मधुर तान सुनाए
ग्वालिन अलग -अलग राग गवाए
शोभा बनूंगा किसी उपवन की
या ताकत हूंगा सघन वन की
बैठ कोई रमणी करेगी विश्राम
या महर्षि लगाएगा तप में ध्यान
बेशक फेंके किसी उजड़ वीरान
सुन न पाऊं मधुर गान
कोई कामिनी पकड़े न डाल
पड़े न झूले सावन के
अलग थोड़ी राह है मेरी
बस यही चाह है मेरी
मुझ पर पंछी चहचहाएं
पके – अधपके फल खाएं
संबल बनूं थके पथिक का
मेरी सूखी डाल भी काम आए
पर जग में कहीं
मेरा नाम न आए

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