साहित्य

बाजल बीन भैंस पगुराइल

अमरेन्द्र

जइसहीं झूलनदास बरवै छंद पढ़ेके शुरू कइलनि कि आगे के सभ कुरसी खाली हो गइलिन सन। दर्सक दीर्घा धधाये लागल। ऊ तऽ, कहीं कि आयोजक बहुते समझदार चाहे लाल बुझक्कड़ रहलनि कि तुरते डीजे चलाके-
” चली ना कवनो बहना बलमु लटगेना मंगा दीं जी”, के चिप्स पेन डरायेभ में डालि के घनाघना दिहलनि। जाम लागि गइल खचाखच। जवन भोजपुरी प्रेमी एक किमी दूर चलि गइल रहनि ऊ हो दुलुकिया चाल धके दउरे लग्न, मजा अतना कि लोग खूशी में नाचे लागेल। लोग के लार लागल गइलि।

         कहे  के  मतलब  कि  नुक्सा  काम  क  गइल,  ना  त  मुँह  मराई  हो  जाइत,  आखिर  मंच  प  जूटल भोजपुरी  विद्वानगन  के  विचार  विमर्श  के  सुनित।    टेंटवाला, माइकवाला के  अलावे  दू  चार गो  बुढ़  पुरनिया  बाचल रहलनि। येह  तरह  से  मंच  के  गरिमा  बचावत, माइक्रोफोन  से  सूचना  दिहल  गइल  कि  अगिला  सत्र  में  '' भोजपुरी भाखा  में  गद्य  विसयक्  चर्चा ",  जानल  मानल  छिक्छाविद  लो  करी। सबसे  पहिले  नामी  गिरामी  कहानीकार  गुलेटन  सरमाजी  के  चानस  मिलल। उहाँ  के  काॅडलेस  मायक  हाथ  में  लेके, भोजपुरी  भाखा  में  पिछला  दशक  में  छपल  कथा,  उपन्यास,  रिपोतार्ज, नाटक  के  बारे  में  आपन  विचार  देबे  जइसहीं  सुरू  कइनि  कि  हमरा  बगल  में  बइठल   एगो  नवही  अपना  संघतिया से फुसफुसा  के  कहे  लागलि, "आरे  मरदे! चलल  जाऊ,  इहाँ  किछु  नइखे। हमनी  के  बोलाके   उल्लू  बनावल  जात  बा, ना  ठुमका,  ना  झुमका,  ना  बाली  ना  लाली,  खाली  बकवास  होता। अतना  कहते  बीच  मेंसे  झुंड  बनाके,   एकेबे  बीस  पच्चीस  गो  भोजपुरी  के  सुधी  सुनवइया  सनसनाते  एके  सथे  पंडाल  से  बहरी  जाये  लगलनि। 

                आयोजक  अनुभवी  होखसु, एनाऊन्सर  श्रमजीवी  होखसु  त  परजीवी  कलाकार  के  लो  के  माला दोसाला भा  रिफ्रेसमेंट  में  चाह  समोसा  देके  रोक  सकत  बानी,  बाकिर  बुद्धिजीवी  दरसक  चाहे  श्रोता  के  रोके  खातिर  मन पसन  लाल  पीयर  नाया डिजाइन  नाया  टेस्ट  के  रिमिक्स  चीझु  चाहीं। आ  उहे  भइल-

“बाजल बीन भैंस पगुराइल।”

अमरेन्द्र
आरा भोजपुर बिहार

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