साहित्य

बीते हुए लम्हों की कसक….

नीरज कुमार मिश्र

आज लगभग दस वर्षों बाद नानी के घर गया। नाना अब इस दुनिया में नहीं हैं। अब बस घर में नानी , मामा – मामी और मेरे ममेरे भाई बहन हैं। ड्राइंग रूम में बैठा हुआ हूं। नानी बहुत बुढ़ी हो गई है। शायद नब्बे वर्ष से भी ऊपर की। वे बेड पर पड़ी हुई थीं। उनकी दृष्टि धूमिल तथा श्रवण शक्ति कम हो चुकी थी।

मुझे देखकर मामी बहुत खुश हुईं। तेज़ क़दमों से मेरी तरफ़ आते हुए बोल रही थीं- ममहर का रास्ता भूल ही गए हो! पहले तो हर दस पंद्रह दिन पर आते थे!”
इस बात पर मैं मुस्कराया। मैं कैसे बताता कि ‘ अब वक़्त बदल गया है। व्यस्तताएं बहुत बढ़ चुकी हैं मामी!’
मामी अपने बच्चों से मेरा पैर छूने को बोलीं।
ममेरे भाई बहन अजीब तरह सा मुंह बनाते हुए मेरा पैर छूने की कोशिश करने का प्रयास किए।
मैं आशीर्वाद देते हुए पूछा- आजकल क्या कर रहे हो!
दोनों ममेरे भाई बहन एक ही साथ बोले – “आन लाईन आईआईटी की तैयारी।” इससे ज्यादा वे बोलना भी नहीं चाह रहे थे।

फिर मैं ड्राइंग रूम के तरफ़ चला गया। बचपन में जिस नानी के घर महीने दो महिने रहने के बाद भी मन नहीं भरता था आज दो मिनट दस साल के बराबर लगने लगा था।

मेरे लिए नाश्ता तैयार कर रही है। मेरे ममेरे भाई बहन अपना अपना स्मार्टफोन हाथ में लिए हुए शोसल मीडिया पर किसी से चैटिंग कर रहे हैं। उनके कान में हेडफोन हैं। वे गाना भी सुन रहे होंगे। उनके पास समय नहीं है मुझसे बात करने की। मुझे बहुत बुरा लग रहा है।

मैं पैर हिलाते हुए इधर उधर नज़र दौड़ाया तो मुझे एक अलमारी में कुछ किताबें और डायरियां दिख रही हैं। टाईम पास करने के लिए सोच रहा हूं कि कोई किताब ही पढ़ लूं यद्यपि मैं किताबें पढ़ने का शौकीन नहीं। सोफे से उठकर किताबों भरी अलमारी में से कोई एक किताब लेने की कोशिश कर ही रहा हूं कि एक डायरी नीचे गिर जाती है फिर मैं नीचे ज़मीन पर झुककर डायरी उठाता हूं।उस पर काफ़ी धूल जम गई थी।
मैंने उस डायरी के पन्नों को पलटने लगा। मुझे महसूस हो गया कि ये डायरी मेरे परम पूज्य नाना जी की डायरी है। वे डायरी पर रोजमर्रा की घटना क्रम को लिखने के शौकीन थे।

डायरी के एक पन्ने पर मेरा नाम लिखा था। अपना नाम देखकर मेरी उत्सुकता बढ़ गई। मैं वह पन्ना पढ़ने लगा।
‘आज मेरा नाती नीरज आया हुआ है। आम के बगीचे में जाकर माली से आम तोडवाना है। शाम को बाजार से उसके लिए गरमा गरम समोसे भी रानी है।उसे समोसे बहुत पसंद है……..।’

मैं पन्ना पलटते गया और प्रत्येक माह में मेरे नाम जिक्र नानाजी के द्वारा किया गया था।

इतना पढ़ते ही मेरी आंँखें सजल हो गईं। और मैं उन बीते हुए लम्हों में खो गया जब नाना जी ज़िंदा थे और नानी पूर्ण स्वस्थ थीं। तब मैं हर दस पंद्रह दिन पर यहां आया करता था। मुझे आया देखकर नानाजी और खुशी से फूले नहीं समाते थे। उस समय मेरे पास न तो बाईक था और न ही कार । फिर भी नानी के घर आने में न तो मुझे वक़्त की कमी थी और न ही शारीरिक थकान ही महसूस होता था। मेरे पास आज संसाधन की कमी नहीं है फिर भी न जाने क्यों मेरे लिए दो मिनट दस साल के बराबर लग रहे हैं और अपनी लग्जरी कार से आने के बावजूद भी बहुत थकान सी हो रही है।
मैं सोच रहा हूं कि अगर आज नाना जी ज़िंदा होते तो आज भी अपनी डायरी में मेरे नाम का जिक्र अपनी डायरी में करते और मेरे लिए बागीचे से आम तथा बाजार से मेरे लिए गरमागरम समोसे का भी जिक्र जरूर ही करते।
अभी मैं उन यादों में खोया ही हुआ था कि मामी की आवाज़ ने मुझे अतीत से वर्तमान में ला दिया।
‘डाईनिंग टेबल पर नाश्ता लग गया है !’ आईए !
मैं अपने आंसुओं को पोंछते हुए डायरी को आलमारी में रखा और डाइनिंग टेबल के तरफ़ धीरे धीरे कदमों से बढ़ने लगा।

नीरज कुमार मिश्र
बलिया

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