साहित्य

भविष्य रो गया

अशोक शर्मा

बहुत पढ़ा- सुना भारत पर,
मेरा मस्तक ऊंचा हो गया ।
शान- वान प्यारी-न्यारी थी ,
न जाने अब क्या हो गया ।

नदियां गन्दी व झरने गन्दे ,
ये अन्न-जल दूषित हो गया ।
साफ- सुथरे लगते हैं बन्दे ,
हवा में धुआं कैसे हो गया ।

सभी भागे दौड़े नजर आते ,
न जाने ऐसा क्या हो गया ।
हंसी चेहरों पे नजर न आवे ,
सब्र- चैन को क्या हो गया ।

हम तो चाहें हवा में उड़ना ,
अरमानों को कौन धो गया ।
साफ सुथरा वातावरण चाहें ,
जहर इसमें कौन घोल गया ।

न चाहिए मुझे मोटर गाड़ी ,
पगडंडियों को क्या हो गया ।
हरे – भरे जंगलों को न रौंदों ,
सपनों का ये भारत खो गया।

पैसे के बिना ही हम जी लेंगे ,
तरक्की में इन्सान खो गया ।
मत दम घोंटो अब जी हमारा,
मासूमों का भविष्य रो गया।।

★★★★★★★★★★★
अशोक शर्मा, कुशीनगर उ०प्र

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