साहित्य

छिकछकगन के प्रणाम

अमरेन्द्र

राम जुग से रामलीला जुग तक गुरु पूर्णिमा मनावे के जज्बा जस के तस बा।एक तरह से कहीं त “गुरु पूर्णिमा मनावल हमनी के जन्मसिद्ध अधिकार बा, आ हमनी सन मनाइये के मानब।

जइसे-जइसे समय बीतल, नाया-नाया सब्दावली अइलिन सन।
जइसे-गुरु घंटाल।
ना जाने गुरु घंटाल सब्द, के बनावल? बाकि ई बात त क्लीयर बा कि कोई घंटाल टाइप आदमी येह सब्द के गुरु साथे जोड़ले होई। कहे कि मतलब ई कि “जे मिलल से गुरु मिलल चेला मिलल ना कोय।”

एगो जबाना रहे, जब गुरु दछिना में जवन मांगत रहनि ऊ मिल जात रहे। गते-गते सभ ची बदलल।गुरुजी के अधिकार छिना गइल, आरक्षण आइल, एकलव्य के एडमिशन हो गइल। गुरु दछिना में अंगूठा देबे के रिवाज बंद हो गइल, अब छात्र गुरुजी के अंगूठा देखावत बारन।

खड़ाऊँ, असनी, कंमडल, पोथी देखते-देखते क्रमशः बाटा के जूता, कुर्सी, गिलास आ ई-बुक हो गइल।मरखवहा गुरुजी फ्रेन्डली हो गइनी। पवलगी-गुड माॅर्निंग हो गइल।

खैर, बदलाव प्रकृति के नियम ह। येकरा के टारल ना सके। रउआ सभे के बहुत बहुत बधाई आ सुकामना बा।

अमरेन्द्र
आरा भोजपुर बिहार

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